Monday, 14 July 2014

अमर बेल

ये यादे भी बड़ी अजीब है
जाने के बाद ही पता नही क्यों आती है
बड़ी बेवफा है ये
हंसा हंसा कर जाने क्यों रुला जाती है

जब तक रहे साथ साथ हम
रही दूरिया हममे
पर दूर  होने पर न जाने
ये आँखे तुम्हे ही क्यों ढूँढती रह जाती है  

या तो हम नही समझ पाए तुमको
या तुमने हमे कभी समझना नही चाहा
क्यों हुआ ऐसा इस  बात की कसक
हमारी उलझन को और बड़ा जाती है

पेढ़ समझ कर लिपट गयी तुम हमसे 
भ्रमा दिया तुमने हमे अपने जिस्म की सुगंध से  
और बहुत देर से समझे हम कि
लिपट कर बड़ जाए बेल कितनी ही
पर जड़े तो उसकी अपनी ही
जमीन में ही रह जाती है

मगर काश समझ पाती अगर तुम
कि जो बेल भूलकर जमीन को अपनी
हवा के सहारे पनप जाती है
और लिपटकर पेढ़ से
खुद से खुद को भूल जाती है  
सिर्फ वो बेल ही अंत में 
अमर बेल कहलाती है

लेखक : प्रवीण चन्द्र झांझी