Monday, 4 December 2023

वक़्त

वक्त कभी कभी इतना तन्हा कर देता है की 
खुद के होने पर ही शक होने लगता है 
कभी कर देता है इतना मसरूफ कि
दुनिया की भीड़ में अपने खो जाने का डर लगने लगता है 
शायद ये ही है जिंदगी का फलसफा 
इंसान  कंही भी पहुंच जाए मगर
वक्त के सामने बौना लगता है ।

प्रवीन झांझी

Saturday, 25 November 2023

आईना

अन्धो के इस शहर में 
दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में 
आवाज भी लगाने को मन नही करता
दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और देखकर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद से ही घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में बिखरे है
अवशेष कुछ टूटे सपनो के
करके याद उन सपनो को
मै खुद ही सहम जाता हूँ

नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी 
आशा के गीत गुनगुनाये थे
करके याद हश्र उन गीतों का
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ

नही चाहता की मिले आँखे
मेरी उन आँखों से क्योंकि 
छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों मै
उन सवालों के जवाब
 मै खुद को नहीं दे पाता हूँ

और इस तरह घबराकर मै
 फेंककर तोढ़ देता हूँ  आइना
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकढ़ो में
 मै अब भी उसी चेहरे को ही मौजूद पाता हूँ

अब आता समझ की नहीं है
 हल भागना किसी समस्या का
समेटकर उन टुकढ़ो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का 
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

यादे

मोढ़ 

आज फिर कुछ बीते पल याद आ गए 
आज फिर वो गुजरे कल हमे रुला गये 
आज फिर तुम्हारी यादो की खुश्बो  ने हमे महका दिया 
आज फिर तुम्हारे चहेरे के नूर ने हमे बहका दिया 

कुछ पल के लिए हम आज को भूल गये 
कुछ पल के लिए हम रिश्तो पर लगे दाग को भूल गए 
भूल गये कुछ पल के लिए की बेवफा हो तुम 
भूल गये कुछ पल के लिए की हो गयी शाम जिस की वो सुबह हो तुम 

की थी जब बेवफाई तुमने तब शायद इतना नहीं रोये थे हम
समझोगी हमारी वफ़ा को इन्ही ख्यालो मै खोये थे हम
फिर बीतते समय की धूल ने उन यादो को छुपा दिया
फिर दिल के आइने मै उभरे नए चहेरो ने तुम्हारे अक्स को भी छुपा दिया

न जाने हुआ क्या आज जो तुम याद आ गयी 
न जाने आज क्यों जीवन के इस मोढ़ पर तुम हमसे टकरा गयी
भूल गए थे जिन पलो को हम 
उन भूली बिसरी यादों को क्यों याद करा गयी

इस मोढ़ पर जब हो गयी हमारे तुम्हारे जीवन की शाम
करके याद अपनी बेवफाई शायद तुम घबरा गयी
देने को सफाई अपनी आखरी पल मै अब आ गयी 

मगर दे पायगो क्या वापिस उन फूलो को 
जो तुमने पैरो के नीचे कुचल दिए
दोगे दिलासा हमे अब क्या इस अंतिम मोढ़ पर
 क्योंकि  हम कहके अलविदा  अब तो चल दिए II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी

Sunday, 17 September 2023

सोच

कुछ लकीरे ऐसी भी 

कुछ आड़ी तिरछी लकीरे जो उठती है मेरे जहन में
कुछ अजीब से अक्श बना जाती है मेरे जिगर में
जब जोड़ने लगता हूँ उनको तो बिखर जाती है 
जब तकता हूँ हैरान सा उनको 
तो मेरी बेबसी पर वो खिलखिलाती है 

नही जानता क्या शक्ल लेना चाहती है वो
नही जानता की कोई है भी के नही वो 
ये भी नही जानता की कभी कोई शक्ल भी बन पायेगी 
ये भी नही जानता कि 
कभी मेरी नजर के सामने भी वो आएगी 

बस ये एक अहसास है 
जो मुझे तन्हाईयो से बचाये रखता है 
मेरी तन्हा जिंदगी में उम्मीदों की शमा जलाये रखता है
तुम लकीरे हो या शख्सियत 
ये बेमायने हे मेरे लिए
तुम कुछ भी हो बस मेरी हो
बस मेरी ये ही अहम है मेरे लिए।

निवेदक  प्रवीन झाँझी

Wednesday, 31 May 2023

भूली यादे

क्या चाहते हो तुम
मैं फिर एक बार
उन यादों में खो जाऊ

हो चुके गडमड जो चेहरे यादों में
मैं फिर उन्हें जहन में ढूंढने निकल जाऊ

मत भेजो यारो उन यादों की गलियों में
कंही फिर एक बार न
लिपट कर उन गलियो की दीवारों
से
कंही अपना आपा न खो जाऊ।

प्रवीन झांझी

कुछ
कुछ दूर सा कुछ पास सा
कुछ अनजाना से कुछ अपना सा
कुछ कहता सा कुछ सुनता सा
वो कुछ भी नही पर सब कुछ है
शायद इसी का नाम अपनापन है

कंही कुछ अपेक्षा नही
पर एक उम्मीद भर है
कि जब जरूरत होगी
तो वो साथ ही होगा
रिश्तो के किसी नाम के बिना
वो मेरा सबसे अपना है ।

प्रवीन झांझी।

एहसास

एहसास 

जब कभी भी मै बहुत तन्हा  होता हूँ
नही होता तब मै पास भी खुद के
होकर व्यस्त मै बहुत, जाने कहाँ होता हूँl

मेरे पास आकर मेरे साथ
मेरे गुजरे हुए पल बैठ जाते है
जाने वो ले जाते है मुझ को कंहा
छोडकर मुझे यादो के समुन्द्र में तन्हा 
खुद वो न जाने  कंहा खो जाते हैl

कभी कुछ अक्स आकर लहरों से
मेरे चेहरे को आंसुओ से भिगो जाते है
कभी कुछ यादो के गर्म हवा के झोंके 
मेरे शरीर को छूकर
कुछ भूले हुए स्पर्शो  के एहसासों में 
डुबो जाते  हैl

कभी कुछ सर्द हवाए बेवफा यादे बनकर
मेरे बदन को झंझोर जाती है
कैसे की हमसफरो ने बेवफाई
ये बाते फिर मेरे जहन में उभर आती हैl

सोचता हूँ मै की ये यादे 
कब मेरा पीछा छोड़ेगी
और कब मेरे आज पर से  
मेरे कल की परछाईया 
अपना मुख मोड़ेगीl
       
ऐ गुजरे जमाने या तो 
मेरे गुजरे कल के सुनहरे पलो को 
मेरे आज का हिस्सा बना दे 
या फिर मत आ बार बार 
रखने  दे मुझे 
मेरे आंसूओ को अपनी पलको में छिपा केl

ये आंसू ही तो 
मेरे चेहरे को भिगोकर 
मुझे खींच कर वापिस आज में ले आते है
और मेरे आज को 
मेरे बीते हुए  कल में डूबने से बचाते हैll

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी