क्षणीकाये
( 1 )
न जाने अपने नसीब में और कितना जहर बाकी है
जबकि पिलाने के लिए सारा जंहा ही साकी है II
( 2 )
मकड़ी है, जाले है
और को फंसाकर,
खुद निकलने को छटपटा रहे है
( ३ )
रकीबों की दुनिया में, करीबी ढूंढता है
गमो की दुनिया में ख़ुशी ढूंढ़ता है
कितना नादान है तू
मुर्दो की दुनिया में जिंदगी ढूंढ़ता है।
( 4 )
हर हंसी ख़ुशी का आइना नही होती
अकसर गम भुलाने को भी
हंसा करते है लोग।
(5 )
पत्थरो पर जमी काई ही
पत्थर में जीवन का एहसास करवाती है।
(6 )
कैक्टस पर उगे चंद फूल उसे ख़ास बना देते है
उन कांटो से नही
बल्कि उन फूलो से वो गुलाब कहलाता है
( 7 )
रेत तो धारा में बह जाती है
जो पानी का बहाव बदल दे
वो ही चट्टान कहलाती है,
रेत तो पानी में बहकर ढूंढ़ती है किनारा
पर चट्टान तो खुद ही किनारा बन जाती है।
( 8 )
पीने दे शराब मुझे तन्हाई में
अभी तो बहुत रात बाकी है
देता है जाम हमे उदासी
और बेवफाई हमारी साकी है।
( 9 )
हम तो है शायर पुराने,
पर जाते नही किसी को हाले दिल सुनाने,
शायद तुमको सुना दिया हमने
क्योंकि देखे है तुमने
मेरे गुजरे हुए जमाने।
(10 )
बर्बादियों से वो ड़रते है, जिन्हे आबाद होने की चिंता है
जो तूफानों में होता है पैदा, वो लहरो को कब गिनता है।
( 11 )
रिश्ते देखे, रिश्तेदार देखे,
मतलब के सजे बाजार देखे
ढूंढने चला जो अपनापन
तो इस शह से सब बेजार देखे।
(12 )
दिल है इतना अकेला
लगता है कि कोई साथी नही
जिंदगी नही है अब जीने के काबिल
है मौत की कमबख्त आती नही।
(13 )
हो सकता है आता है उन्हें जीने में मजा
हमे तो ये जिंदगी बेकार लगती है
मै तो हूँ ही जिंदगी से बेजार
पर जिंदगी तो मुझसे भी ज्यादा मुझसे बेजार लगती है।
(14 )
उन्होंने कत्ल भी करा तो तुमने शुक्र कह दिया
हमने फूल भी तोड़ा तो तुमने कुफ्र कह दिया
( 15 )
अरे नाशुक्रो, तुम क्या करोगे अदा शुक्रिया
क्योंकि हो जिस बस्ती के तुम बाशिंदे
वो बस्ती है बदकारो की
तुम तो लंगड़े घोड़ो की बस्ती के एक घोड़े हो
तुम कद्र क्या जानो घुड़सवारों की।
( 16 )
तेरी महफ़िल में आ गए तो
ऐसा नही कि मेरी मुहब्बत बदनाम हो गयी
ये तो तड़प ले आयी वफ़ा की हमारी
जो तेरी बेवफाई से परेशान हो गयी।
( 17 )
जिन्दा हूँ मै क्योंकि मौत नही आती
खुश हूँ मै जब तक गमो की बात नही होती
अपनी बर्बादी से ही तो चर्चा में है हम
वरना तो कंही हमारी कोई बात नही होती।
( 18 )
आया गम और पूछा ,
ऐ गमजदा बता तुझे क्या गम है
कहा मैंने की नही है ख़ुशी कोई
ये गम क्या कम है,
फिर आई ख़ुशी और पूछा
ऐ खुशनसीब बता तू खुश क्यों है
कहा मैंने की नही है गम कोई
ये ख़ुशी क्या कम है।
( 19 )
पढ़ना मेरी डायरी को
ऐ रकीबों मेरे मरने के बाद
क्योंकि ये मुर्दापरस्तों की दुनिया है
जो सिर्फ मरने वालो के
कदमो के निशान ढूंढ़ती है।
लेखक : प्रवीन चन्द्र झाँझी
( 1 )
न जाने अपने नसीब में और कितना जहर बाकी है
जबकि पिलाने के लिए सारा जंहा ही साकी है II
( 2 )
मकड़ी है, जाले है
और को फंसाकर,
खुद निकलने को छटपटा रहे है
( ३ )
रकीबों की दुनिया में, करीबी ढूंढता है
गमो की दुनिया में ख़ुशी ढूंढ़ता है
कितना नादान है तू
मुर्दो की दुनिया में जिंदगी ढूंढ़ता है।
( 4 )
हर हंसी ख़ुशी का आइना नही होती
अकसर गम भुलाने को भी
हंसा करते है लोग।
(5 )
पत्थरो पर जमी काई ही
पत्थर में जीवन का एहसास करवाती है।
(6 )
कैक्टस पर उगे चंद फूल उसे ख़ास बना देते है
उन कांटो से नही
बल्कि उन फूलो से वो गुलाब कहलाता है
( 7 )
रेत तो धारा में बह जाती है
जो पानी का बहाव बदल दे
वो ही चट्टान कहलाती है,
रेत तो पानी में बहकर ढूंढ़ती है किनारा
पर चट्टान तो खुद ही किनारा बन जाती है।
( 8 )
पीने दे शराब मुझे तन्हाई में
अभी तो बहुत रात बाकी है
देता है जाम हमे उदासी
और बेवफाई हमारी साकी है।
( 9 )
हम तो है शायर पुराने,
पर जाते नही किसी को हाले दिल सुनाने,
शायद तुमको सुना दिया हमने
क्योंकि देखे है तुमने
मेरे गुजरे हुए जमाने।
(10 )
बर्बादियों से वो ड़रते है, जिन्हे आबाद होने की चिंता है
जो तूफानों में होता है पैदा, वो लहरो को कब गिनता है।
( 11 )
रिश्ते देखे, रिश्तेदार देखे,
मतलब के सजे बाजार देखे
ढूंढने चला जो अपनापन
तो इस शह से सब बेजार देखे।
(12 )
दिल है इतना अकेला
लगता है कि कोई साथी नही
जिंदगी नही है अब जीने के काबिल
है मौत की कमबख्त आती नही।
(13 )
हो सकता है आता है उन्हें जीने में मजा
हमे तो ये जिंदगी बेकार लगती है
मै तो हूँ ही जिंदगी से बेजार
पर जिंदगी तो मुझसे भी ज्यादा मुझसे बेजार लगती है।
(14 )
उन्होंने कत्ल भी करा तो तुमने शुक्र कह दिया
हमने फूल भी तोड़ा तो तुमने कुफ्र कह दिया
( 15 )
अरे नाशुक्रो, तुम क्या करोगे अदा शुक्रिया
क्योंकि हो जिस बस्ती के तुम बाशिंदे
वो बस्ती है बदकारो की
तुम तो लंगड़े घोड़ो की बस्ती के एक घोड़े हो
तुम कद्र क्या जानो घुड़सवारों की।
( 16 )
तेरी महफ़िल में आ गए तो
ऐसा नही कि मेरी मुहब्बत बदनाम हो गयी
ये तो तड़प ले आयी वफ़ा की हमारी
जो तेरी बेवफाई से परेशान हो गयी।
( 17 )
जिन्दा हूँ मै क्योंकि मौत नही आती
खुश हूँ मै जब तक गमो की बात नही होती
अपनी बर्बादी से ही तो चर्चा में है हम
वरना तो कंही हमारी कोई बात नही होती।
( 18 )
आया गम और पूछा ,
ऐ गमजदा बता तुझे क्या गम है
कहा मैंने की नही है ख़ुशी कोई
ये गम क्या कम है,
फिर आई ख़ुशी और पूछा
ऐ खुशनसीब बता तू खुश क्यों है
कहा मैंने की नही है गम कोई
ये ख़ुशी क्या कम है।
( 19 )
पढ़ना मेरी डायरी को
ऐ रकीबों मेरे मरने के बाद
क्योंकि ये मुर्दापरस्तों की दुनिया है
जो सिर्फ मरने वालो के
कदमो के निशान ढूंढ़ती है।
लेखक : प्रवीन चन्द्र झाँझी