तन्हाई
आज फिर किसी ने मुझे तन्हा कर दिया
बड़े विश्वास से थामा था
दामन किसी का मैंने
पर बड़ी बेदर्दी से उसने
मेरा हाथ झटक दिया
ऐसा नही है कि
सदा अकेला ही चला दुनिया की राहो पर
मगर वक़्त बदलते ही
हरेक ने मुझे अपने कारवां से बाहर कर दिया
अब होने आई जब
जिन्दगी की शाम तो
थक गया हूँ मै
और नही सह सकता
ये जिन्दगी के धूप छाँव
तो बांह पकडकर मुझे
राह पर एक तरफ खड़ा कर दिया
मै तो खड़ा खड़ा भी
नेपथ्य में कर लूँगा
इन्तजार रात का
पर जब तुम जागोगे नींद से
और नही पाओगे निशान भी मेरे
तब समझोगे की कोई था
अपना जो आज छोडकर चल दिया II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी