Wednesday, 9 July 2025

तन्हाई

तन्हाई 

आज फिर किसी ने मुझे तन्हा कर दिया 

बड़े विश्वास से थामा था
दामन किसी का मैंने

पर बड़ी बेदर्दी से उसने 
मेरा हाथ झटक दिया 

ऐसा नही है कि 
सदा अकेला ही चला दुनिया की राहो  पर 

मगर वक़्त बदलते ही 

हरेक ने मुझे अपने कारवां से बाहर कर दिया  

अब होने आई जब 
जिन्दगी की शाम तो 
थक गया हूँ मै 
और नही सह सकता 
ये जिन्दगी के धूप छाँव 

तो बांह पकडकर मुझे 
राह पर एक तरफ खड़ा कर दिया 

मै तो खड़ा खड़ा भी 
नेपथ्य में कर लूँगा 
इन्तजार रात का 

पर जब तुम जागोगे नींद से 
और नही पाओगे निशान भी मेरे 

तब समझोगे की कोई था 
अपना जो आज छोडकर चल दिया  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

Saturday, 5 July 2025

यथार्थ

यथार्थ (REALITY)
उढ़ लो जितना उढ़ना है 
   मगर वापिस लोटकर यही आना है 
      घोंसले आकाश में नहीं बनते
      आखिर बनाना जमीन पर ही आशियाना है

पेड़ हो चाहे ऊँचा जितना
  आधार उसे फिर भी धरा को ही बनाना है
    आज वक़्त की बुलंदियों पर हो तुम
    लगता है तुम्हे की कदमो में तुम्हारे जमाना है

आज तुम हो जहाँ 
कल कोई और था वहा
  कल फिर कोई और होगा वंहा 
यही इस जीवन का अफसाना है

    डूबते सूरज की लाली समझाती है तुझे
      हो गयी शाम अब तुम्हे घर जाना है
     नहीं समझ पाते तुम की थोड़ी देर मै 
       आकाश को ढक लेगा अंधकार
    तब दिशा का ज्ञान भी तुम्हे कहा रह जाना है
    
सफलता के आकाश में 
भूल जाते है जो जमीन को
   पढ़ता उन्हें फिर पीछे से पछताना है
     तभी तो कहते है
  मत भूलो उस समय को
   जब छोडकर सब कुछ यही
     आखिर फिर इसी धरा की गोद में जाना है l

              लेखक    प्रवीन चंदर झांझी        

Tuesday, 27 May 2025

वक़्त

क्या चाहते हो तुम
मैं फिर एक बार 
उन यादों में खो जाऊ

हो चुके गडमड 
जो चेहरे मेरी यादों में
मैं फिर उन्हें जहन में
 ढूंढने निकल जाऊ

मत भेजो मुझे 
उन यादों की गलियों में
कंही फिर एक बार न लिपट कर 
उन गलियो की दीवारों से
कंही अपना आपा न खो जाऊ।

प्रवीन झांझी

Sunday, 18 May 2025

चाहत

रिश्तो को झेल रहा हूँ
जाती हुई सुबह की शाम देख रहा हूँ
ऐसा नही सोचता था कि 
मैं जो चाहता हूँ वो हो जाता
मगर ऐसा भी नही हुआ कि 
जो मैं नही चाहता था सिर्फ वो हुआ 
न खुश हूँ न नाराज हूँ
बस वक्त की हिमाकत देख रहा हूँ।

प्रवीन झांझी

Monday, 14 April 2025

नादान




कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुप चाप देखता हूँ क्योंकि
जमाने को अब मै  कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ 

आँखे सब देखती है पर जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि खामोश रहकर भी
आँखों से बहुत कुछ कहा जा सकता है
ख़ामोशी की जुबान मै कुछ कुछ जानने लगा  हूँ

इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
 कोई चेहरा भी अब पहचान नही पाता
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ

कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
 सारी जिन्दगी गंवा दी और
अब जब जिन्दगी की शाम हो गयी है
तो इस बात पर हँसू या रोऊँ  कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ   II

प्रवीन चन्द्र झांझी

Tuesday, 18 March 2025

सलीका

तुम क्यो मुझसे मुझे
छीनना चाहते हो
मैं तो पूरा ही तुम्हारा था
तुमने मुझे मुझको वापिस दिया
अब फिर क्यो मुझे मुझसे
वापिस छीनना चाहते हो।

जबकि न तुम मुझे ठीक से अपना सके
न कभी ठीक से ठुकरा सके
जब चाहा बुला लिया
जब चाहा ठुकरा दिया
यह तो कोई जिंदगी का सलीका न हुआ

या तो हमसफर बन जाओ
या फिर बेवफा कहलाओ
जब बनोगे हमसफ़र
तो वफ़ा भी आ जायेगी
जब चलोगे साथ चन्द कदम
तो राहे भी खुद खुल जाएंगी

जब खुलेंगी राहे तो
मंजिल भी नजर आएंगी
यह मंजिल की चाह ही तो है
जो जिंदगी खुद ब खुद चली जायेगी
और हर सांस जीने का
सलीका बन जाएगी।

प्रवीन झांझी।

Monday, 3 March 2025

अधूरे लोग

अधूरे लोग 

कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है 
सब के होते हुए भी पास 
वो दिल से सदा सूने रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है l

जब चाहते है वो किसी को, 
तो चाहते है इस शिद्त से  
कि सामने वाला भी 
उस चाहत से जाता है घबरा 
 नहीं पता वो समझ 
कि है या नही वो काबिल उस चाहत के  
और इसी उलझन में वो 
खुद को पाता है दोराहे पर खड़ा 
 मगर चाहतो के सफर में 
वो सबसे बेखबर 
सदा अपने सपनो से जुडे रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है l

वो रहते है अधूरे क्योंकि 
उन्हें वक्त कि वफ़ा नही मिलती  
उन्हें मिलता है तब 
जब उसे पाने की चाह नही रहती 
रोते है अरमान उनके 
पर जुबान बेवफा कुछ नही कहती 
उनके साथ यह सब  होता है 
क्योंकि वो अपने से परायो से घिरे रहते है 
कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है l

जब नहीं दिया तुमने हमें अपना अधूरापन
तब हम तुमे अपना अधूरापन कैसे दिखाते 
शायद तुम तो सिर्फ़ जीना चाहती थी
 खुद के लिए  
मगर हम तो सिर्फ जीना चाहते थे 
तुम्हारे लिए 
और वाकिफ थी तुम फितरत से हमारी 
इसीलिए चाहती थी कि 
तुम्हारे सूनेपन के गड्डे हम भर जाते 
शायद समझती थी तुम 
कि चाहे हो जाए  कितने भी तन्हा हम
 पर तुमसे शिकवे का कभी कोई 
शब्द भी न कहते हम l

मगर है ये हद  हमारी दीवानगी की 
कि या तो हम रहते साथ तुम्हारे
,या फिर अपनी चाहतो के साथ रहते हम 
हम तो अकेले ही संजीदगी से 
अपने सपनो से जुड़े 
तन्हाई के आगोश में रहते  है 
बेखुदी में भी बाते सिर्फ 
तुम्हारे साथ करते रहतें है 
नादान दिल को रहते ये समझाते हम 
कि कुछ लोग हमेशा अधूरे रहते है l

होते है दीवाने ऐसे भी 
जो रहकर भी अकेले होते हैं मस्त इतने 
कि अपनी मुहब्ब्त कि अपूर्णता में भी 
इतने पूरे रहते है 
नही करते किसी से 
वो शिकवा बेवफाई का 
उस बेवफा की पूर्णता में ही 
अपने अधूरेपन को भी भूले रहते है
शायद इसीलिए कुछ लोग अधूरे रहकर भी 
खुद में पूरे रहते है
और नादान जमाने की  नजर में 
वो लोग हमेशा अधूरे रहते है II 

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी