Monday, 15 September 2014

ऑंखें बोलती हें 
                    
कहते हें की ऑंखें बोलती हें 
         कभी बचों की ऑंखें
          उत्सुकता से राहे जोतती हें
कही जवानी की ऑंखें
    सुनहरे सपनो को तोलती हें
वही अधेढ़ो की आँखों मै
   चिन्ताओ की रेखाए ढोलती हें
और आते आते बुढ़ापा
   आँखों मै यादे खोजती  हें
जी हाँ ऑंखें बोलती हें  II


लेखक :प्रवीन  चन्द्र झाँझी 
कलयुग का महाभार
  
सिर्फ नहीं हुआ था त्रेता युग में महाभारत
  बल्कि कलयुग में भी एक महाभारत चल रहा है
   तब तो जंग खून के रिश्तो में थी
     अब तो खून ही रंग बदल रहा है

तब हुआ था चीर हरण द्रोपदी का
  अब तो गांधारी  का ही चीर खतरे में पडा है
    तब तो दुशासन ने किया था हरन चीर का
      अब तो अर्जुन भी उसके साथ मिला  है

तब युद्ध का कारण था एक धृतराष्ट्र
  अब तो पूरा देश ही धृतराष्ट्रों से भरा है
    तब लड़ी थी उन्होंने जंग सिदान्तो की
     आज कौरव पांडव मानते है दोनों 

       कि सिदान्तो में क्या धरा है

मिल बांटकर खाते है दोनों
  जानते है की लड़ने   में क्या धरा है 
   खूब देखा खूब आजमाया सबको
     थक कर भीष्म पितामह (जनता)
        बाणों की शैया पर पढ़ा है

एक तरफ खडा दुर्योधन गदा लिए
   दूसरी तरफ अर्जुन तीर ताने खडा  है
     इन दोनों से कौन बचाएगा मुझे
       पितामह(जनता) यह सोच कर डरा है  II


           लेखक    प्रवीन  चंदर झांझी   
 आज  

तुम तो कुछ पल की तन्हाई से घबरा गए 
  हमारे तन्हाई के क्षणो का तो कोई हिसाब नहीं 
    दुनिया के सागर में बहे थे हम
       कब बनकर लहर यह तो कुछ याद नहीं

अब तो किनारे पर पढ़े है समुंदर के 

 बनकर निशचल चट्टान
  हिला देता है कोई बैठकर हम पर वर्ना
   जीवन का तो हममे कोई एहसास नहीं

घने पेढ़ की जढ़ की गांठ से है हम
  किसी आंधी से हिलती है जब टहनिया
    छूती है तब धूप हमको, 

     मगर सहकर कितनी धूप 
       किया इस पेड़ को घना 
        इसकी तो कंही बात नहीं

चाहें हो लहर या चट्टान या फिर गांठ
   तन्हाई में अपनी कोई सोच सकता है 
      सिर्फ गुजरे कल की बात 

        क्योंकि पास उसके 
          अपना कोई आज नहीं  II

                  लेखक   प्रवीन चंदर झांझी     
अपने 
अपनों ने दिए कुछ जखम वो 
   जो न भरते है न फटते है 
      बस रिसते रहते है 

संग तुम्हारे जो बिताये कल 
  वो न भूलते है न जाते है 
      बस मेरे आज में अटके बैठे है 

तुम्हारे जुल्मो की दास्ताँ किससे कहे
    हम तो न हँसते न रोते है
     बस सिसकते रहते है

सुख के दिनों में साथ रहे  हर ख़ुशी मेरे साथ बांटी
   पर वक़्त बदलते ही बदल ली नज़र
     उन रकीबो को ही दुनिया वाले अपने कहते है   II


                          लेखक     प्रवीन चंदर झांझी  
यथार्थ (REALITY)
उढ़ लो जितना उढ़ना है 
   मगर वापिस लोटकर यही आना है 
      घोंसले आकाश में नहीं बनते
        आखिर बनाना जमीन पर ही आशियाना है

पेढ़ हो चाहे ऊँचा जितना
  आधार उसे फिर भी धरा को ही बनाना है
     आज वक़्त की बुलंदियों पर हो तुम
       लगता है तुम्हे की कदमो में तुम्हारे यह जमाना है

आज तुम हो जहाँ कल मै था वहा
  कल होगा कोई और यहाँ 
   यही इस जीवन का अफसाना है
    डूबते सूरज की लाली समझाती है तुझे
      हो गयी शाम अब तुम्हे घर जाना है

थोढ़ी देर मै आकाश को ढक लेगा अंधकार
  तब दिशा का ज्ञान भी तुम्हे कहा रह जाना है
    सफलता के आकाश मै भूल जाते है जो जमीन को
       पढ़ता उन्हें फिर पीछे से पछताना है

तभी तो कहते है
  मत भूलो उस समय को
   जब छोढ़कर सब कुछ यही
     आखिर मिटटी मै मिल जाना है  II

              लेखक  : प्रवीन चन्द्र झाँझी   प्रवीन चंदर झांझी
अलविदा 

जिन्दगी मत कर उदास इतना की 
   मै तुझसे उदास हो जाऊ
     अगर मै तुझसे उदास हो गया 
         तो बहुत उदास हो जायगी तू 

कभी बहुत चाहता था मै तुझे 
  पर उस शिद्धत से न चाह पाई तू मुझे 
     कभी डरता था मै खोने से तुझे 
        अब मुझे खोने के डर से 
         क्यों डर लगता है तुझे   

कुछ रही  होंगी मजबुरिया तेरी   
  कुछ होंगे स्वार्थ तेरे
   वर्ना यह जानकर भी कि 
      नहीं रहेगे  हम साथ हमेशा    
       न कभी इस तरह तू दुत्कारती मुझे 

जितना भी था साथ हमारा
  काश हो जाता उसमे कुछ ऐसा
    गर्व से कह पाते हम भी
      क्या खूब जिए हम साथ तेरे

मिलना बिछढ़ ना तो है विधान विधि का
  अफ़सोस तो है यह कि 
    न तुम खुश हो पाई हमसे
     न कभी हम समझ पाये तुझे  
      अब कहते है अलविदा  
       क्योंकि  छा गए है अब यह 
        आखिरी रात के अँधेरे घने  II
                     लेखक: प्रवीन  चन्द्र झाँझी 
 विदाई की बेला


मत करो शिकवा की
   अब विदाई की बेला है
      जब आई थी मिलन की बेला 
          तब थे गुलदस्ते हमारे हाथ में

चलते चलते साथ साथ 
   मुरझा गई सब फूल 
      सूख गई सब पतिया
         बिखरे गए  है कांटे सब तरफ अब राह में

होकर लहू लुहान इन काँटों से
   जो थे बिखेरे तुमने मेरी राह में 
     कहते है हम फिर भी की 
       भूल जाओ सब कुछ 
         कयोंकि यह विदाई की बेला है 

सदियों से समय के सागर में बहते 
    अनगनित भंवरो के तूफ़ान को सहते 
      आखिर हम इस जनम में आन  मिले 
        कुछ पल साथ रहे 
         कुछ कदम साथ चले 
           कुछ क्षण  साथ जिए
            
   कुछ पल प्यार किया 
      फिर कुछ अघात किया 
       थोड़ा विश्वास किया 
        फिर कभी धोखा किया 
         मगर फिर भी कहते है हम 
          कि छोढ़ो यह सब
      कयोंकि यह विदाई की बेला है

     बिछढ़े जो अब 
     जाने फिर मिले कब 
       चल देंगे राह अपनी अपनी 
         होकर वक़्त की धार पर सवार सब 

जाने फिर हम एकदूजे को 
  पहचाने या न पहचाने 
     न जाने याद रहे न रहे 
      हमें हमारी ये मुलाक़ाते  
        इसीलिए कहते है हम 
         अब रहने दो ये शिकवे  
          कयोंकि अब तो यह 
            विदाई की बेला है II

         लेखक प्रवीन चन्द्र झाँझी 
पहला और आखरी सत्य 

मेले में घर बनाना चाहते हो 
  रौशनी से आंगन सजाना चाहते हो
    और चाहते हो की बनी रहे यह रौनक हमेशा 
       खुशिओ की रेत से आँचल भराना चाहते हो 

कभी सोचा है की
 है यह मेला चार दिन का 
   न फिर होंगे तम्बू, न होगी  रोशिनी 
    न होंगी महफ़िल न कोई मजमा होगा 

और चल देगा कारवां जिन्दगी  
  जब तुझको तनहा छोड़ कर 
    खढ़ा होगा अकेला तब तू 
      जिन्दगी के आखरी छोर पर  

तब करगा महसूस 
  कि जानते है सब ये,मानते है सब  
   पर जानकार भी, मानकर भी
     नहीं समझना चाहते ये सच  
    
कि न समझकर इसको
 बच पायेगा क्या कोई इस से
     है जीवन  का यह भेद  ऐसा
      उलझा हुआ है हर कोई इसमें

जिस दिन इन्सान यह समझ जायेगा
   झूठ, फरेब अपने पराये का भेद वो  भूल जायेगा
      समझ जायेगा यह पहला ओर आखरी सत्य
       की अकेला आया है अकेला ही जायेगा II

               लेखक प्रवीण चंदर झांजी  
वो सुबह

मेरी ख़ामोशी ही मेरी जुबान है
    वर्ना बहुत बोलकर भी अक्सर
      कुछ कह नहीं पाते लोग,

मेरी सादगी ही मेरी पहचान है
  वर्ना बहुत कुछ कर के भी
    पहचान नहीं बना पाते लोग,

मेरी नज़र ही मेरी उदासीनता का
निशान है वर्ना बहुत रोकर भी
              जीवन से  मुह नहीं मोढ़ पाते लोग,

मेरे कर्म ही मेरे वैराग्य कि पहचान है
  वर्ना पहनकर गेरुआ भी
     दुनिया से मुह नहीं मोढ़ पाते लोग,

है परेशानी नहीं लोगो कि के दुखी है वो 
     अक्सर दुसरो के सुख से 
       भी दुखी हो जाते है लोग, 

अपने गरेबान कि धूल पर
   नहीं नज़र डालते लोग 
     दूसरो के घरो मै अक्सर झांकते है लोग

होता है मतलब जब अपना
   तो दूंढ लेते है पाताल मै भी
   वर्ना सामने होकर भी नहीं पहचानते लोग,

मरने पर दूसरो के जताते है शोक
  आनी है बारी भी अपनी
   यह जानकर भी नहीं जानना चाहते लोग

देखकर कालिमा इस जीवन कि रात कि
  क्यों घबरा जाते है, होगी फिर नई सुबह
     यह क्यों भूल जाते है लोग II

लेखक प्रवीण चंदर झांजी
  

Friday, 12 September 2014

पुकार 

माँ जब से छूटा है आंचल तेरा 
मै तब से ठीक से सोया नही 
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे 
तब से कभी खुलकर मै रोया नही 

जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे 
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी 
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे 
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी 

कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी 
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी

जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की 
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी

जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी

जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया 

जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी

जो बालक तेरा घबरा जाता था एक 
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में  खड़ा 
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है

कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा 
मै तब से ठीक से सोया नही 
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे 
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
मंजिल के पार 

परिंदे के जब पर निकले 
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार 
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा 

फिर जब भरी उड़ान पहली 
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा

फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा

इसी तरह बीतता गया समय 
और वो यू ही सोचता हुआ 
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर 
अपने घोंसले में लौट आता था

हो जाती थी रात और वो 
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा

फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब 
मंजिल और दूर होने लगी

फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी