Friday, 12 September 2014

ऊंचाई

जितनी होती है इमारत ऊँची, 
उतनी ही नीवे गहरी होती है 
जितनी होती है ऊँची हंसी, 
उतनी ही उसमे उदासी ठहरी होती है 


बिना धरती को गहरा खोदे 
कभी ऊँची इमारत नही बनती
बहाये न मजदूर अगर पसीना तो 
कभी किसी इमारत को ऊंचाई नही मिलती  


मगर उन गहराइओ में न जाने 
कितने रिश्तो  के अहसास दफन होते है
हरेक सफल इन्सान की नीवो में  
बहुत से असफल लोगो के कफन  पड़े होते है 
जब बनाता है इमारत तो 
इंसान ने अनगनित सपने सजाये होते है 
पर जब खुदती है धरती तो 
उसने न जाने कितने आंसू संजोये होते है
जब खोदता है इंसान 
तो सोचता है इंसान कि क्या हुआ
मै इस गड्डे को इंटो और गारे से भर दूंगा
डाल दूंगा सरिया इसमें 
और इसे और मजबूत कर दूंगा
भूल जाता है इंसान कि 
माँ वसुंधरा को पक्की ईंट नही
अपनी बिछुड़ी कच्ची मिटटी प्यारी होती है 
जितनी होती है इमारत......................................


लगता है देखने वालो को कि 
उन ऊंचाईओ पर रहने वाले खुश  है बहुत
क्योंकि वो कितना ऊँचा पहुंच गये है 
मगर वो नही जानते कि वो ऊंचाई पर रहने वाले
अपनी पैरो की जमीन को नीचे ही छोड़ चुके है

हो जाओ बड़े कितने ही पर ये मत भूलो कि
अद्रश्य ही सही पर बच्चे और माँ की  
नाडू हमेशा बंधी रहती है
कही भी पहुंच जाओ किसी भी ऊंचाई से देखो
पर ये समझ लो कि 
जमीन ही हरेक की आखरी मंजिल  है 
हर इमारत आखिर  जमीन पर ही ठहरी रहती  है


इसीलिए जितनी होती है इमारत ऊँची, 
उतनी ही नीवे गहरी होती है 
जितनी होती है ऊँची हंसी, 
उतनी ही उसमे उदासी ठहरी होती है II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

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