एहसास
जब कभी भी मै बहुत तन्हा होता हूँ
होकर व्यस्त मै बहुत, जाने कहाँ होता हूँ
मेरे पास आकर मेरे साथ
मेरे गुजरे हुए पल बैठ जाते है
जाने वो कंहा ले जाते है मुझ को
और छोडकर मुझे यादो के समुन्द्र में तन्हा
खुद वो न जाने कंहा खो जाते है
कभी कुछ अक्स आकर लहरों से
मेरे चेहरे को आंसुओ से भिगो जाते है
कभी कुछ यादो के गर्म हवा के झोंके
मेरे चेहरे को आंसुओ से भिगो जाते है
कभी कुछ यादो के गर्म हवा के झोंके
मेरे शरीर को छूकर
कुछ भूले हुए स्पर्शो के
कुछ भूले हुए स्पर्शो के
एहसासों में डुबो जाते है
और कभी कुछ सर्द हवाए बेवफा यादे बनकर
मेरे बदन को झंझोर जाती है
कैसे की हमसफरो ने बेवफाई
ये बाते फिर मेरे जहन में उभर आती है
मेरे बदन को झंझोर जाती है
कैसे की हमसफरो ने बेवफाई
ये बाते फिर मेरे जहन में उभर आती है
और सोचता हूँ मै की
ये यादे कब मेरा पीछा छोड़ेगी
और कब मेरे आज पर से
और कब मेरे आज पर से
मेरे बीते कल की परछाईया
मेरे आने वाले कल के लिए
रौशनी का रास्ता छोड़ेगी
ऐ ! गुजरे जमाने या तो मेरे गुजरे कल के
सुनहरे पलो को मेरे आज का हिस्सा बना दे
या फिर मत आ बार बार पास मेरे
और रखने दे मुझे मेरे आंसूओ को
अपनी पलको के आँचल में छिपा के
ये आंसू ही तो मेरे चेहरे को भिगोकर कर
मुझे खींच कर वापिस आज में ले आते है
और मेरे आज को
मेरे बीते हुए कल में डूबने से बचाते है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
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