Monday, 15 September 2014

 आज  

तुम तो कुछ पल की तन्हाई से घबरा गए 
  हमारे तन्हाई के क्षणो का तो कोई हिसाब नहीं 
    दुनिया के सागर में बहे थे हम
       कब बनकर लहर यह तो कुछ याद नहीं

अब तो किनारे पर पढ़े है समुंदर के 

 बनकर निशचल चट्टान
  हिला देता है कोई बैठकर हम पर वर्ना
   जीवन का तो हममे कोई एहसास नहीं

घने पेढ़ की जढ़ की गांठ से है हम
  किसी आंधी से हिलती है जब टहनिया
    छूती है तब धूप हमको, 

     मगर सहकर कितनी धूप 
       किया इस पेड़ को घना 
        इसकी तो कंही बात नहीं

चाहें हो लहर या चट्टान या फिर गांठ
   तन्हाई में अपनी कोई सोच सकता है 
      सिर्फ गुजरे कल की बात 

        क्योंकि पास उसके 
          अपना कोई आज नहीं  II

                  लेखक   प्रवीन चंदर झांझी     

No comments:

Post a Comment