Monday, 15 September 2014

यथार्थ (REALITY)
उढ़ लो जितना उढ़ना है 
   मगर वापिस लोटकर यही आना है 
      घोंसले आकाश में नहीं बनते
        आखिर बनाना जमीन पर ही आशियाना है

पेढ़ हो चाहे ऊँचा जितना
  आधार उसे फिर भी धरा को ही बनाना है
     आज वक़्त की बुलंदियों पर हो तुम
       लगता है तुम्हे की कदमो में तुम्हारे यह जमाना है

आज तुम हो जहाँ कल मै था वहा
  कल होगा कोई और यहाँ 
   यही इस जीवन का अफसाना है
    डूबते सूरज की लाली समझाती है तुझे
      हो गयी शाम अब तुम्हे घर जाना है

थोढ़ी देर मै आकाश को ढक लेगा अंधकार
  तब दिशा का ज्ञान भी तुम्हे कहा रह जाना है
    सफलता के आकाश मै भूल जाते है जो जमीन को
       पढ़ता उन्हें फिर पीछे से पछताना है

तभी तो कहते है
  मत भूलो उस समय को
   जब छोढ़कर सब कुछ यही
     आखिर मिटटी मै मिल जाना है  II

              लेखक  : प्रवीन चन्द्र झाँझी   प्रवीन चंदर झांझी

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