Monday, 15 September 2014

ऑंखें बोलती हें 
                    
कहते हें की ऑंखें बोलती हें 
         कभी बचों की ऑंखें
          उत्सुकता से राहे जोतती हें
कही जवानी की ऑंखें
    सुनहरे सपनो को तोलती हें
वही अधेढ़ो की आँखों मै
   चिन्ताओ की रेखाए ढोलती हें
और आते आते बुढ़ापा
   आँखों मै यादे खोजती  हें
जी हाँ ऑंखें बोलती हें  II


लेखक :प्रवीन  चन्द्र झाँझी 

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