पुकार
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही
जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी
कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी
जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी
जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी
जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया
जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी
जो बालक तेरा घबरा जाता था एक
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में खड़ा
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है
कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही
जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी
कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी
जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी
जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी
जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया
जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी
जो बालक तेरा घबरा जाता था एक
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में खड़ा
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है
कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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