Friday, 12 September 2014

पुकार 

माँ जब से छूटा है आंचल तेरा 
मै तब से ठीक से सोया नही 
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे 
तब से कभी खुलकर मै रोया नही 

जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे 
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी 
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे 
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी 

कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी 
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी

जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की 
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी

जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी

जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया 

जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी

जो बालक तेरा घबरा जाता था एक 
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में  खड़ा 
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है

कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा 
मै तब से ठीक से सोया नही 
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे 
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

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