Monday, 15 September 2014

पहला और आखरी सत्य 

मेले में घर बनाना चाहते हो 
  रौशनी से आंगन सजाना चाहते हो
    और चाहते हो की बनी रहे यह रौनक हमेशा 
       खुशिओ की रेत से आँचल भराना चाहते हो 

कभी सोचा है की
 है यह मेला चार दिन का 
   न फिर होंगे तम्बू, न होगी  रोशिनी 
    न होंगी महफ़िल न कोई मजमा होगा 

और चल देगा कारवां जिन्दगी  
  जब तुझको तनहा छोड़ कर 
    खढ़ा होगा अकेला तब तू 
      जिन्दगी के आखरी छोर पर  

तब करगा महसूस 
  कि जानते है सब ये,मानते है सब  
   पर जानकार भी, मानकर भी
     नहीं समझना चाहते ये सच  
    
कि न समझकर इसको
 बच पायेगा क्या कोई इस से
     है जीवन  का यह भेद  ऐसा
      उलझा हुआ है हर कोई इसमें

जिस दिन इन्सान यह समझ जायेगा
   झूठ, फरेब अपने पराये का भेद वो  भूल जायेगा
      समझ जायेगा यह पहला ओर आखरी सत्य
       की अकेला आया है अकेला ही जायेगा II

               लेखक प्रवीण चंदर झांजी  

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