Friday, 12 September 2014

नतीजा 

मेरी आँख में छुपी नमी को हरेक ने देखा 
पर शायद तुम्हारी आँखे 
मेरी उस नमी को देख नही पाई


मेरी आवाज के दर्द को हरेक ने पहचाना मगर
शायद वो मेरी  दर्द भरी आवाज 
तुम कभी सुन नही पायी


यह 'शायद' ही शायद एक कड़ी है हमारे रिश्ते की
यह 'शायद' का भ्रम ही वजह है मेरी तसल्ली की 

डरता हूँ कि जिस दिन ये शायद 
हम दोनों के बीच  से हट जाएगा
उस दिन हमारा यह रिश्ता भी 
किसी नतीजे पर पहुंच जाएगा


या तो हम बह निकलेगे 
मिलकर मचलती लहरों की तरह
नही तो रह जायेंगे  
शायद देखते दूर से एक दुसरे को
नदी के दो किनारों की तरह .... दो किनारों की तरह          II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

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