Friday, 12 September 2014

परछाई 

आज फिर कोई धुंधली सी याद आई है 
फिर पड़ी मेरे आज पर 
किसी बीते हुए कल की परछाई है 


फिर याद आ गया वो हसीन समां 
जो संग संग हमने बिताया था 
कितना कम हसांया उन पलो ने
और बाद में उन पलो की यादो ने 
कितना हमे रुलाया था


हम तो भूल चुके है तुम्हे
पर क्यों तुम रह रह कर 
यादों में आ जाते हो
जब कोई रिश्ता ही नही बन पाया हम में
तो क्यों आकर अपनापन जताते हो


जाओ दूर चले जाओ मेरे बीते हुए कल
पीछे से देकर आवाज मेरे आज को मत पुकारो
चमकने दे मेरे आने वाले कल को
अपनी परछाई से उसे मत बिगाड़ो    II

लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी   

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