Monday, 15 September 2014

 विदाई की बेला


मत करो शिकवा की
   अब विदाई की बेला है
      जब आई थी मिलन की बेला 
          तब थे गुलदस्ते हमारे हाथ में

चलते चलते साथ साथ 
   मुरझा गई सब फूल 
      सूख गई सब पतिया
         बिखरे गए  है कांटे सब तरफ अब राह में

होकर लहू लुहान इन काँटों से
   जो थे बिखेरे तुमने मेरी राह में 
     कहते है हम फिर भी की 
       भूल जाओ सब कुछ 
         कयोंकि यह विदाई की बेला है 

सदियों से समय के सागर में बहते 
    अनगनित भंवरो के तूफ़ान को सहते 
      आखिर हम इस जनम में आन  मिले 
        कुछ पल साथ रहे 
         कुछ कदम साथ चले 
           कुछ क्षण  साथ जिए
            
   कुछ पल प्यार किया 
      फिर कुछ अघात किया 
       थोड़ा विश्वास किया 
        फिर कभी धोखा किया 
         मगर फिर भी कहते है हम 
          कि छोढ़ो यह सब
      कयोंकि यह विदाई की बेला है

     बिछढ़े जो अब 
     जाने फिर मिले कब 
       चल देंगे राह अपनी अपनी 
         होकर वक़्त की धार पर सवार सब 

जाने फिर हम एकदूजे को 
  पहचाने या न पहचाने 
     न जाने याद रहे न रहे 
      हमें हमारी ये मुलाक़ाते  
        इसीलिए कहते है हम 
         अब रहने दो ये शिकवे  
          कयोंकि अब तो यह 
            विदाई की बेला है II

         लेखक प्रवीन चन्द्र झाँझी 

No comments:

Post a Comment