Friday, 12 September 2014

  इन्कलाब
हर तरफ ये कोलाहल कैसा है
अरे यंहा क्या बिक रहा है 
अरे ये तो इंसान जैसा है 

यंहा तो रिश्तो का व्यापार हो रहा है 
कोई माँ का, कोई बाप का, कोई बहन का, कोई भाई का 
कोई दोस्त का तो कोई पडोस का व्यापार कर रहा है 
कोई औलाद का तो कोई कोई तो 
भगवान का भी व्यापार कर रहा है

जिन रिश्तो तो पर कभी करता था वो गर्व 
अब उन रिश्तो के ईमान का सौदा 
इंसान सरे बाज़ार कर रहा है

हर तरफ फैली ये चकाचौंध क्यों है 
कंही कुछ भी स्पष्ट नही दिखाई देता क्यों है 
सिर्फ दिख रही है तो परछाईया 
स्वार्थ, झूठ और   बईमानी की
दौलत के लालच ने कर दिया है अँधा इंसान को 
और न उसूल है न शर्म है बस घूमती है 
हर दिमाग में दौलत की कहानी ही 
  
सिवा स्वार्थ के उसे कुछ भी दिखाई नही दे रहा है 
नही देख पा रह वो इस चमक के पीछे छुपे अन्धकार को 
वो पागलो की भांति दिशा हीन सा इधर उधर भाग रहा है 
न कोई सिद्धांत, न दिशा न जीवन का मार्ग ही पता है 
न उसके पास है कोई जीने की  प्रेरणा 
न कोई उसे अपनी अकांक्षाओ की सीमा ही पता है 

अब मानव जानवरों को जीना सिखाने की बजाए
खुद जानवरों की तरह जीना सीख गया है
न उसे परिवार चाहिये, न उसे सुरक्षित  समाज चाहिये   
बस उसे तो दौलत के पीछे भागने के लिए 
रेगिस्तान में फैली मृग तृष्णाओं का तलाब चाहिये

है अच्छा ये ही की चल दू मै चुपचाप यंहा से 
नही तो मुझे तो जीने के लिए यंहा पर इन्कलाब चाहिये II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झाँझी 

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