जाने क्यों
जाने क्यों मर मर कर जीते है लोग
ज जाने क्यों जीने के लिए
हर पल मरते है लोग
क्या मरने से बचना ही जीवन का मतलब है
क्या सिर्फ सांस का चलना ही जीवन का लक्षण है
कुछ पल की हंसी के लिए
क्यों बरसों तक रोते है लोग
क्यों कुछ थोड़ा सा पाने के लिए
अपना पूरा जीवन खो देते है लोग
जीवन की छाया है मृत्यु,
प्राणों बिन काया है मृत्यु
सहमा सा क्यों रहता है मरने से अरे
जीवन की तो भार्या है मृत्यु
अगर मरेगा तभी तो जीवन पायेगा
और अगर जीएगा तभी तो मर पायेगा
यू डर डर कर तो न तूं मरेगा न ढंग से जी पायेगा
मर मर कर जियेगा तो बिना जिए ही मर जायेगा
जिन्दगी तो मौत की दासी है
ये तो है मौत की मर्जी की वो कब आती है
मौत की तो परछाईं भी
जब चाहे जीवन को डराती है
वैसे भी दिन में तू कितनी बार मरता है
जब भी बोलता है झूठ, जब भी करता है फरेब
तब भी तो तू खुद के सामने खुद मरता है
जीवन को तू जीता कम
और जीवन में ज्यादा
मौत के डर से बार बार मरता है
उठ खड़ा हो जा
जब तक जी शान से जी
और जब न जी सके
तो हमेशा के लिए मर जा
खुददारी का नाम ही तो जीना है वरना
तो हर पल मरते हुए
अपमान का घूँट पीना है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
जाने क्यों मर मर कर जीते है लोग
ज जाने क्यों जीने के लिए
हर पल मरते है लोग
क्या मरने से बचना ही जीवन का मतलब है
क्या सिर्फ सांस का चलना ही जीवन का लक्षण है
कुछ पल की हंसी के लिए
क्यों बरसों तक रोते है लोग
क्यों कुछ थोड़ा सा पाने के लिए
अपना पूरा जीवन खो देते है लोग
जीवन की छाया है मृत्यु,
प्राणों बिन काया है मृत्यु
सहमा सा क्यों रहता है मरने से अरे
जीवन की तो भार्या है मृत्यु
अगर मरेगा तभी तो जीवन पायेगा
और अगर जीएगा तभी तो मर पायेगा
यू डर डर कर तो न तूं मरेगा न ढंग से जी पायेगा
मर मर कर जियेगा तो बिना जिए ही मर जायेगा
जिन्दगी तो मौत की दासी है
ये तो है मौत की मर्जी की वो कब आती है
मौत की तो परछाईं भी
जब चाहे जीवन को डराती है
वैसे भी दिन में तू कितनी बार मरता है
जब भी बोलता है झूठ, जब भी करता है फरेब
तब भी तो तू खुद के सामने खुद मरता है
जीवन को तू जीता कम
और जीवन में ज्यादा
मौत के डर से बार बार मरता है
उठ खड़ा हो जा
जब तक जी शान से जी
और जब न जी सके
तो हमेशा के लिए मर जा
खुददारी का नाम ही तो जीना है वरना
तो हर पल मरते हुए
अपमान का घूँट पीना है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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