Monday, 15 September 2014

अलविदा 

जिन्दगी मत कर उदास इतना की 
   मै तुझसे उदास हो जाऊ
     अगर मै तुझसे उदास हो गया 
         तो बहुत उदास हो जायगी तू 

कभी बहुत चाहता था मै तुझे 
  पर उस शिद्धत से न चाह पाई तू मुझे 
     कभी डरता था मै खोने से तुझे 
        अब मुझे खोने के डर से 
         क्यों डर लगता है तुझे   

कुछ रही  होंगी मजबुरिया तेरी   
  कुछ होंगे स्वार्थ तेरे
   वर्ना यह जानकर भी कि 
      नहीं रहेगे  हम साथ हमेशा    
       न कभी इस तरह तू दुत्कारती मुझे 

जितना भी था साथ हमारा
  काश हो जाता उसमे कुछ ऐसा
    गर्व से कह पाते हम भी
      क्या खूब जिए हम साथ तेरे

मिलना बिछढ़ ना तो है विधान विधि का
  अफ़सोस तो है यह कि 
    न तुम खुश हो पाई हमसे
     न कभी हम समझ पाये तुझे  
      अब कहते है अलविदा  
       क्योंकि  छा गए है अब यह 
        आखिरी रात के अँधेरे घने  II
                     लेखक: प्रवीन  चन्द्र झाँझी 

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