Friday, 28 February 2014

अदा 
वो मेरी वफाओ का जवाब क्या देंगे
जो खुद कभी नही जले 
वो रोशिनी के लिए मेरे चिरागो को आफताब क्या देंगे   
जिन्होंने मनाया है सदा जशन मेरी बर्बादी का
वो मुझे देखकर आबाद 
अब  मुबारकबाद भी  क्या देंगे 

अगर तुम न चाहते 
तो हम बर्बाद न  होते 
हम भी होते कामयाब 
अगर तुम हमारे राजदार न होते 

जख्म तो हमेशा अपने ही देते है 
क्योंकि अपने ही सदा हमारे करीब होते है 
गैरो को क्या पता 
कि हमे किस बात से तकलीफ होती है 

अब तेरी बेवफाई का रोना रोये
 कि अपनी वफाओ की नाक़मयाबी का मातम मनाये 
क्योंकि तुम अब भी चले आते हो हमारी जिंदगी में जब जी  चाहे 
तुम्हारी बेवफाई ने किया हमे  कंहा कंहा से  जख्मी 
 हम ये तुम्हे कैसे समझाये 
न कोई शिकवा न कोई मलाल 
बस खड़े हो जाते हो तुम सामने हमारे बड़ी मासूमीयत से नजरे झुकाये 

शायद ये ही  वो तुम्हारी  एक अदा है 
कि जिस पर हम फ़िदा है।  


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

ऋतू परिवर्तन 

शरद ऋतू की ये हल्की सी धूप 
आहिस्ता आहिस्ता आंगन में फैलती जा रही है 
जो बनके लू दहकती थी  कभी अंगारों की तरह 
वो ही अब होकर ठंडी, 
दिन की मोहताज होती जा रही है  I


सूरज के निकलते ही सोचकर उसकी उष्णता को 
जो पृथ्वी डरकर कांपकर सहम जाती थी 
वो ही पृथ्वी अब ओढकर ठंड का दोशाला 
खड़ी सूरज की गर्मी को मुंह चिड़ा रही है  I 


जानती है वो की आगे मौसम है सर्दी का 
और उसका आस्तित्व धुंध में लिपट जाएगा 
नही होगी उष्णता सूरज की गर्मी में और 
वो उसका आवरण भेद नही पायेगा I


मगर नही सोचती पृथ्वी की 
परिवर्तन शील है चक्र प्रकृति का 
बाद सर्दी के एक बार फिर जीवन चक्र में 
सूरज दुबारा गरमा जाएगा I
और बाद बसंत के  एक बार  
गर्मी का मौसम फिर से आएगा    
और भरकर सूरज उष्णता से 
उसे फिर से  जला जाएगा  I


इसी  तरह चलता है चक्र प्रकृति का 
चाहे हो सूरज, पृथ्वी या हो इन्सान  
परिवर्तन शील है हर चीज़ यहाँ पर 
कुछ भी स्थाई होने का 
न हो किसी को कोई गुमान  I  


बदलना ऋतू का ये ही तो जीवन की कहानी  है 
बदलो न जो ऋतू के साथ 
ये ही सच्चे इन्सान की निशानी है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 
जरूरत 

मन को  कुछ भी अच्छा नही लगता
कंही कोई रिश्ता सच्चा नही लगता
सब करना चाहते है एक दूसरे  का इस्तेमाल
करते है सब हर दम खुशिया तलाश
पर फिर भी सब दीखते है उदास
न जाने क्यों कोई हँसता नही लगता

ऊँची हंसी, कहकहे, ये ऐश आराम,
मगर फिर भी है सबके दिल परेशान
बहुत अकेला है मन
नही लगता की कोई चलेगा संग
हर पल अपने पराये की परिभाषा बदल रही है
और आने से हर रिश्ते की सच्चाई सामने
जीवन की आशा अब निराशा में बदल रही है

बड़े अरमानो से सजोया था
इस जिंदगी में रिश्तो की बगिया को
जो कि अब अपने आप में ही
एक तमाशा बन रही है

ऐ दूसरो को इस्तेमाल करने वालो
पहले अपने सामर्थ को तो पूरा इस्तेमाल करना जानो
जब खुद को इस्तेमाल करना सीख जाओगे
तब हो जाओगे खुद में बुलंद इतना कि
किसी और को नीचा दिखाने की
जरूरत ही नही महसूस कर पाओगे II
  
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी

  

कहते है की महबूब  रब होता है
पर बन जाता है पत्थर की  मूर्त
बेवफा वो जब होता है
ऐ मेरे यार मत बन बेवफा
कभी कभी ही मिलते है सच्चे चाहने वाले
वरना मंदिर में भी पाखंडियो का मेला लगा होता है

Tuesday, 18 February 2014

तन्हाई 
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है
बोला मन कि जब तन से हो अलग उड़ जाता है मन
तब वो तन से निकली हुई एक आह होती है
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है


यादो के पंखो पर बैठ कर मन जब
अतीत के आकाश में  उड़ जाता है
कभी रोता है कुछ याद करके  और
कभी खुद ब खुद मुस्कराता है
पर है ये नियति जिस्म की
 के  फिर भी होठ उसके मुस्कराते है और
आँखे भी उसी की रोती है,
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

है समुन्द्र तन्हाई का गहरा इतना कि
मन इसमें न जाने कंहा डूब जाता है
और वक़्त  की मृगतृष्णा में भटककर
जब ढूंढता है
इन समय की सीपियो में ख़ुशी के मोती 
तब जिस्म की इस किश्ती को
साँसों की पतवार ही  ढोती है

पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

पूछा फिर दिल ने की जब उड़ता है मन
 तो जिस्म ये तन्हाई का बोझ क्यों उठाता है
हंस कर बोल मन की 
जब आती है मिलन की बेला 
तो सच्चे प्रेमी कि तरह मिटजाता है जिस्म
और दिल मन के साथ उड़ जाता है
जिन्दगी मौत के जब मिलती है गले 
तब हो जाता है जिस्म तन्हा इतना
कि फिर तन्हाई की गुंजाईश भी कंहा होती है
 पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से 
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

प्रवीन चन्द्र झांझी
    
 वजह 
क्या वजह है कि हर अनजान चेहरे में हर वक्त
कुछ जानी पहचानी सी लकीरे ढूँढता हूँ
जिन्दगी की भागम-भाग में पीछे छूट गये जो
उन जाने पहचाने चेहरो का पता
इन अनजान चेहरो  से क्यों पूछता हूँ,

जब मिटाए थे वो अक्स दिल के रेगिस्तान से
तो न सोचा था ये कि 
कुछ धुंधली सी बिखरी हुई अस्पष्ट लकीरे
दिल में बाकी खिची रह जाएगी,
इस टूटे हुए दिल में 
कुछ यादे बाकी रह जायेगी 
अब जिन्दगी की शाम के धुंधलके में
उन अधमिटी लकीरों पर चलकर
उन अनजान राहों से अपनी खोई हुई
मंजिल का पता पूछता हूँ,
और इन मुरझाये फूलो में
इस बगिया के उजड़ने का कारण ढूँढता हूँ


ये न जानता था कि
कुछ सपने इस तरह टूट जाते है
बिछड़ जाते है हमसफ़ररात के 
मगर अपनी यादो का खुमार छोड़ जाते है   
जाग तो गया नींद से मगर
दिन के उजालो से
रात के उस  हमसफर का पता पूछता हूँ,
और कैसा नादान हूँ 
दिन की तपती दोपहरी में 
रात की रंगीनियों का समां ढूंढ़ता हूँ 

नही जान पाता 
कि  क्यों हो गये वो अनजान हमसे
छुप गया हो जैसे कोई चाँद चिलमन में 
नही मानता ये कमबख्त दिल 
तभी तो उस वसंत के फूलो की खुशबू
इन पतझड़ की झाड़ियो में सूंघता हूँ

हर अनजान चेहरे में हर वक्त
कुछ जानी पहचानी सी लकीरे क्यों ढूँढता हूँ ............I

लेखक :  प्रवीन चन्द्र झांझी
   तन्हाई 

आज फिर किसी ने मुझे तन्हा कर दिया 
बड़े विश्वास से थामा था दामन किसी का मैंने
पर बड़ी बेदर्दी से उसने मेरा हाथ झटक दिया
ऐसा नही है की सदा अकेला ही चला दुनिया की राहो  पर
मगर वक़्त बदलते ही
हरेक ने मुझे अपने कारवां से बाहर कर दिया 
अब जब जिन्दगी की शाम होने को आई 
थक गया हूँ मै और जिन्दगी के धूप छाँव अब सह नही सकता 
तो वक़्त ने बांह पकडकर मुझे राह पर एक तरफ खड़ा कर दिया 
मै तो खड़ा खड़ा नेपथ्य में कर लूँगा इन्तजार रात का 
पर जब तुम जागोगे नींद से और नही पाओगे निशान भी मेरे
तब समझोगे की कोई था अपना जो आज छोडकर चल दिया  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 
अंधे बहरो  की बस्ती 

अन्धो के इस शहर में दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में 
आवाज भी लगाने को मन नही करता
कभी कभी मै बहुत अकेला हो जाता हूँ
इतना अकेला की हवा में उड़ने लगता हूँ
न कोई मुझे छु पाता है
न किसी के पास होने का एहसास मुझे सताता है
न अपने होने का एहसास मुझे रहता है
ये मन न कुछ सुनता है न कुछ कहता है
बस एक शून्य में ताकता रहता है
न  खोता  है कुछ न कुछ पाने को जी चाहता है
इस दुनिया की भीड़ को बस
 भागते हुए  ताकता सा रह जाता है
क्या खो गया है इनका और क्या खोज रहे है सब
ये सोच कर जी घबराता है

ये न पा सकने की कुंठा कंही इनके मन को भटका न जाए
यूं भागते-भागते थक कर कंही हारकर ये सो न जाए
जो कौमे थककर-हारकर सो जाती है
उनके आने वाली नसले सदा के लिए  अपनी पहचान खो जाती है
600 की देश की गुलामी को याद करके  
 देखता हूँ इन नेताओ की तरफ 
कंही पर भी कुछ ठीक नही होता लगता  
इसीलिए अन्धो के इस शहर में 
दिया जलाने को भी मन नही करता
और गूंगे - बहरो की इस बस्ती में 
आवाज भी लगाने को मन नही करता। 

लेखक प्रवीन चंद्र झांझी 

   
यंहा सब बिकता है 

हर तरफ हर जुबान पर बस एक ही किस्सा है
खरीदने वाला चहिये यंहा हर माल बिकता है
बेइमान नेताओ के हाथो
देश का सम्मान बिकता है
कुछ डालरों में इनका ईमान बिकता है
हो अगर मालदार ससुर तो, दामाद बिकता है
नही देता अगर पैसा तो
बाप भी बेटे को साँप सा दीखता है
कुछ सिक्को के बदले विज्ञापनों में 
नारी के तन से आंचल खिसकता है
हो माल अगर जेब में तो
बुढ्ढा पति भी जवान दीखता है
और गरीब को तो जवान पत्नी भी
मौत का सामान दीखता  है
न कोई सिद्धांत, न कोई भावना
बस काली कमाई ही है जिनकी कामना
इन  नेताओ को तो देश की जनता
बस एक बाज़ार में बिकने वाला सामान दीखता है
कुछ तो शर्म करो, न इतना जुल्म करो
वर्ना जब होती है जुल्म की इन्तहा तो
उसके गर्भ से बस  इन्कलाब निकलता है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी  
पहला प्यार 
तुमसे मिलने से पहले नही जानते थे की प्यार क्या होता है
तुमसे बिछड़ने के बाद ये भी याद नही की यार क्या होता है
जिस शिदत से चाहा तुम्हे
फिर वो चाहत किसी और के लिए अपने दिल में जगा  नही पाया
क्योंकि तुमने दिल के किसी कोने को कभी खाली ही रहने न दिया 
इसलिए  फिर किसी और को अपने दिल में बसा नही पाया


शायद तभी कहते है की पहला प्यार ही असली प्यार होता है
बाकी तो सब रिश्तो को व्यापार होता है
व्यापार में तो कामयाबी की ख़ुशी और
नाकामयाबी का अवसाद  होता है
पर पहले प्यार में तो जिंदगी का मतलब बस यार होता है 
न कोई  ख़ुशी अपनी न कोई गम अपना 
बस सब कुछ यार के चेहरे पर ही निसार  होता है
मुस्करा देता है यार अगर तो खुदा का दीदार होता है 
चुरा ली नजर कंही यार ने तो सारा जहान ही वीरान होता है


माना की हम चंद लम्हे ही संग संग गुजार पाए
पर कैसी होती जिन्दगी अगर वो गुजरती तुम्हारे साथ
इस सोच से कभी हम खुद को जुदा न कर  पाए
जिन्दगी की इस शाम में जब सांझ की किरने भी साथ छोड़ने को है
तब भी उषा की पहली  किरण को हम अब भी भुला नही पाये 


ऐ रब जितना सोचता हूँ इतनी ही वफा हो मेरे यार में अगर 
तो मिलवाना सदा के लिए उससे अगले जन्म
क्योंकि इस जन्म में तो हम उनकी नजदीकियों  का अहसास कर  नही पाये 
नही तो  रखना इतनी ही छोटी मुलाकातमेरी  मेरे यार से
गुजार पाऊ याद में उस मुलाकात के बाकी अपनी  जिन्दगी
कि  सिवा यार के हम याद कर न पाये 


ऐ मेरे रब बस है इल्तजाह तुझसे इतनी   
कि करवाना अहसास मेरे यार को कि
चाहता हूँ बहुत शिदत से मै उस 
क्योंकि मै  व्यापार नही सिर्फ  
प्यार करता हूँ, सिर्फ  प्यार करता हूँ।

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
      
कहानी 
ऐ दिले नादान है तू बदकिस्मत कितना की
लूटा तुझे जिसने सरे राह
उसीके पास रपट लिखवानी पडती है
है दिए जख्म जिसने तुझे
उसी से दवा लगवानी पडती है
साथ जीने मरने की कसमे, वो वादे, वो अहसास
वो सब अब  बे मायनी बाते   लगती  है
जब गुजर गयी रात
तो उस रात की हर बात पुरानी  लगती है
 मान ले ऐ मन मेरे की
कोई नही है कद्रदान तेरे अहसासों का
तेरी अब हर बात  बेकार कहानी लगती है II


प्रवीन चंद्र  झांझी 
आशा 
बुझ गया है दीप मन का फ़िर भी
जीवन के आँगन मे उम्मीद का दिया जलाया हुआ है
 अपनी उदासी की दीवार पर मुस्कान का दर्पण लगाया हुआ है
 किसी को क्या पता की इन मुस्कराते लबो के पीछे
हमने आंसुओ का एक सैलाब छुपाया हुआ है     
नादान 

कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुपचाप देखता हूँ सब कुछ 
क्योंकि जमाने को अब मै  
कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ 

आँखे सब देखती है पर 
जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि बेगानो के इस जंगल में 
कोई अपनी सी आवाज़ अब आती नही 
ख़ामोशी की जुबान मै शायद 
कुछ कुछ जानने लगा  हूँ

और इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
 कोई शक्ल भी अब पहचान में आती नही 
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ

कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
जिन्दगी की शाम हो गयी है
नही जानता कि 
इस बात पर हँसू या रोऊँ  कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ   II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी