Friday, 28 February 2014

अदा 
वो मेरी वफाओ का जवाब क्या देंगे
जो खुद कभी नही जले 
वो रोशिनी के लिए मेरे चिरागो को आफताब क्या देंगे   
जिन्होंने मनाया है सदा जशन मेरी बर्बादी का
वो मुझे देखकर आबाद 
अब  मुबारकबाद भी  क्या देंगे 

अगर तुम न चाहते 
तो हम बर्बाद न  होते 
हम भी होते कामयाब 
अगर तुम हमारे राजदार न होते 

जख्म तो हमेशा अपने ही देते है 
क्योंकि अपने ही सदा हमारे करीब होते है 
गैरो को क्या पता 
कि हमे किस बात से तकलीफ होती है 

अब तेरी बेवफाई का रोना रोये
 कि अपनी वफाओ की नाक़मयाबी का मातम मनाये 
क्योंकि तुम अब भी चले आते हो हमारी जिंदगी में जब जी  चाहे 
तुम्हारी बेवफाई ने किया हमे  कंहा कंहा से  जख्मी 
 हम ये तुम्हे कैसे समझाये 
न कोई शिकवा न कोई मलाल 
बस खड़े हो जाते हो तुम सामने हमारे बड़ी मासूमीयत से नजरे झुकाये 

शायद ये ही  वो तुम्हारी  एक अदा है 
कि जिस पर हम फ़िदा है।  


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

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