Tuesday, 18 February 2014

यंहा सब बिकता है 

हर तरफ हर जुबान पर बस एक ही किस्सा है
खरीदने वाला चहिये यंहा हर माल बिकता है
बेइमान नेताओ के हाथो
देश का सम्मान बिकता है
कुछ डालरों में इनका ईमान बिकता है
हो अगर मालदार ससुर तो, दामाद बिकता है
नही देता अगर पैसा तो
बाप भी बेटे को साँप सा दीखता है
कुछ सिक्को के बदले विज्ञापनों में 
नारी के तन से आंचल खिसकता है
हो माल अगर जेब में तो
बुढ्ढा पति भी जवान दीखता है
और गरीब को तो जवान पत्नी भी
मौत का सामान दीखता  है
न कोई सिद्धांत, न कोई भावना
बस काली कमाई ही है जिनकी कामना
इन  नेताओ को तो देश की जनता
बस एक बाज़ार में बिकने वाला सामान दीखता है
कुछ तो शर्म करो, न इतना जुल्म करो
वर्ना जब होती है जुल्म की इन्तहा तो
उसके गर्भ से बस  इन्कलाब निकलता है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी  

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