Tuesday, 18 February 2014

 वजह 
क्या वजह है कि हर अनजान चेहरे में हर वक्त
कुछ जानी पहचानी सी लकीरे ढूँढता हूँ
जिन्दगी की भागम-भाग में पीछे छूट गये जो
उन जाने पहचाने चेहरो का पता
इन अनजान चेहरो  से क्यों पूछता हूँ,

जब मिटाए थे वो अक्स दिल के रेगिस्तान से
तो न सोचा था ये कि 
कुछ धुंधली सी बिखरी हुई अस्पष्ट लकीरे
दिल में बाकी खिची रह जाएगी,
इस टूटे हुए दिल में 
कुछ यादे बाकी रह जायेगी 
अब जिन्दगी की शाम के धुंधलके में
उन अधमिटी लकीरों पर चलकर
उन अनजान राहों से अपनी खोई हुई
मंजिल का पता पूछता हूँ,
और इन मुरझाये फूलो में
इस बगिया के उजड़ने का कारण ढूँढता हूँ


ये न जानता था कि
कुछ सपने इस तरह टूट जाते है
बिछड़ जाते है हमसफ़ररात के 
मगर अपनी यादो का खुमार छोड़ जाते है   
जाग तो गया नींद से मगर
दिन के उजालो से
रात के उस  हमसफर का पता पूछता हूँ,
और कैसा नादान हूँ 
दिन की तपती दोपहरी में 
रात की रंगीनियों का समां ढूंढ़ता हूँ 

नही जान पाता 
कि  क्यों हो गये वो अनजान हमसे
छुप गया हो जैसे कोई चाँद चिलमन में 
नही मानता ये कमबख्त दिल 
तभी तो उस वसंत के फूलो की खुशबू
इन पतझड़ की झाड़ियो में सूंघता हूँ

हर अनजान चेहरे में हर वक्त
कुछ जानी पहचानी सी लकीरे क्यों ढूँढता हूँ ............I

लेखक :  प्रवीन चन्द्र झांझी

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