अंधे बहरो की बस्ती
अन्धो के इस शहर में दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में
आवाज भी लगाने को मन नही करता
कभी कभी मै बहुत अकेला हो जाता हूँ
इतना अकेला की हवा में उड़ने लगता हूँ
न कोई मुझे छु पाता है
न किसी के पास होने का एहसास मुझे सताता है
न अपने होने का एहसास मुझे रहता है
ये मन न कुछ सुनता है न कुछ कहता है
बस एक शून्य में ताकता रहता है
न खोता है कुछ न कुछ पाने को जी चाहता है
इस दुनिया की भीड़ को बस
भागते हुए ताकता सा रह जाता है
क्या खो गया है इनका और क्या खोज रहे है सब
ये सोच कर जी घबराता है
ये न पा सकने की कुंठा कंही इनके मन को भटका न जाए
यूं भागते-भागते थक कर कंही हारकर ये सो न जाए
जो कौमे थककर-हारकर सो जाती है
उनके आने वाली नसले सदा के लिए अपनी पहचान खो जाती है
600 की देश की गुलामी को याद करके
देखता हूँ इन नेताओ की तरफ
कंही पर भी कुछ ठीक नही होता लगता
इसीलिए अन्धो के इस शहर में
दिया जलाने को भी मन नही करता
और गूंगे - बहरो की इस बस्ती में
आवाज भी लगाने को मन नही करता।
लेखक प्रवीन चंद्र झांझी
अन्धो के इस शहर में दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में
आवाज भी लगाने को मन नही करता
कभी कभी मै बहुत अकेला हो जाता हूँ
इतना अकेला की हवा में उड़ने लगता हूँ
न कोई मुझे छु पाता है
न किसी के पास होने का एहसास मुझे सताता है
न अपने होने का एहसास मुझे रहता है
ये मन न कुछ सुनता है न कुछ कहता है
बस एक शून्य में ताकता रहता है
न खोता है कुछ न कुछ पाने को जी चाहता है
इस दुनिया की भीड़ को बस
भागते हुए ताकता सा रह जाता है
क्या खो गया है इनका और क्या खोज रहे है सब
ये सोच कर जी घबराता है
ये न पा सकने की कुंठा कंही इनके मन को भटका न जाए
यूं भागते-भागते थक कर कंही हारकर ये सो न जाए
जो कौमे थककर-हारकर सो जाती है
उनके आने वाली नसले सदा के लिए अपनी पहचान खो जाती है
600 की देश की गुलामी को याद करके
देखता हूँ इन नेताओ की तरफ
कंही पर भी कुछ ठीक नही होता लगता
इसीलिए अन्धो के इस शहर में
दिया जलाने को भी मन नही करता
और गूंगे - बहरो की इस बस्ती में
आवाज भी लगाने को मन नही करता।
लेखक प्रवीन चंद्र झांझी
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