Tuesday, 18 February 2014

ऋतू परिवर्तन 

शरद ऋतू की ये हल्की सी धूप 
आहिस्ता आहिस्ता आंगन में फैलती जा रही है 
जो बनके लू दहकती थी  कभी अंगारों की तरह 
वो ही अब होकर ठंडी, 
दिन की मोहताज होती जा रही है 

 I
सूरज के निकलते ही सोचकर उसकी उष्णता को 
जो पृथ्वी डरकर कांपकर सहम जाती थी 
वो ही पृथ्वी अब ओढकर ठंड का दोशाला 
खड़ी सूरज की गर्मी को मुंह चिड़ा रही है 


जानती है वो की आगे मौसम है सर्दी का 
और उसका आस्तित्व धुंध में लिपट जाएगा 
नही होगी उष्णता सूरज की गर्मी में और 
वो उसका आवरण भेद नही पायेगा I


मगर परिवर्तन शील है चक्र प्रकृति का 
बाद सर्दी के एक बार फिर जीवन चक्र में 
सूरज दुबारा गरमा जाएगा I
और बाद बसंत के  एक बार  
गर्मी का मौसम फिर से आएगा    
और भरकर सूरज उष्णता से 
उसे फिर से  जला जाएगा  I


इसी  तरह चलता है चक्र प्रकृति का 
चाहे हो सूरज, पृथ्वी या हो इन्सान  
परिवर्तन शील है हर चीज़ यहाँ पर 
स्थाई होने का न हो किसी को कोई गुमान  I  


परिवर्तन ऋतू का ये ही तो जीवन की कहानी  है
 बदले  न जो ऋतू के साथ 
ये ही सच्चे इन्सान की निशानी है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

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