सलीका
है ये वक़्त का सितम या मेरी बेवफाई
कि तन्हा तो हूँ मगर
यादे तुम्हारी अब मेरा पीछा नही करती
अभी भी कभी कभी भटक जाती है
आँखे मेरी जिंदगी की गली के उस मोड़ पर
जँहा मोहब्ब्त के गीतो पर थी तुम कभी थिरका करती
कभी घंटो एक दूसरे की आँखों में
सपनो में खोये जिंदगी की रूमानिया ढूँढ़ते थे
और अब मौत से डर तो लगता है
पर जीने की इच्छा नही करती
चाहूँ तो अब भी ढूंढ लूं तुमको
मगर जानता हूँ मै कि
तुम जमाने से नही बल्कि
हमारी मोहब्ब्त की
कशिश की तपिश से हो डरती
अगर चाहूँ तो अब भी
बाँध लूँ चाहत से तुम्हे
पर कहता है दिल कि
जब यार को नही है सलीका मोहब्ब्त का
तो कर दे आजाद उसे यादो से भी अपनी।
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
है ये वक़्त का सितम या मेरी बेवफाई
कि तन्हा तो हूँ मगर
यादे तुम्हारी अब मेरा पीछा नही करती
अभी भी कभी कभी भटक जाती है
आँखे मेरी जिंदगी की गली के उस मोड़ पर
जँहा मोहब्ब्त के गीतो पर थी तुम कभी थिरका करती
कभी घंटो एक दूसरे की आँखों में
सपनो में खोये जिंदगी की रूमानिया ढूँढ़ते थे
और अब मौत से डर तो लगता है
पर जीने की इच्छा नही करती
चाहूँ तो अब भी ढूंढ लूं तुमको
मगर जानता हूँ मै कि
तुम जमाने से नही बल्कि
हमारी मोहब्ब्त की
कशिश की तपिश से हो डरती
अगर चाहूँ तो अब भी
बाँध लूँ चाहत से तुम्हे
पर कहता है दिल कि
जब यार को नही है सलीका मोहब्ब्त का
तो कर दे आजाद उसे यादो से भी अपनी।
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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