Tuesday, 18 February 2014

सलीका 

है ये वक़्त का सितम या  मेरी बेवफाई
कि तन्हा तो हूँ मगर
यादे तुम्हारी अब मेरा पीछा नही करती

अभी भी कभी कभी भटक जाती है
आँखे मेरी जिंदगी की गली के उस मोड़ पर
जँहा मोहब्ब्त के गीतो पर थी तुम कभी  थिरका करती

कभी घंटो एक दूसरे की आँखों में 
सपनो में खोये जिंदगी की  रूमानिया ढूँढ़ते थे 
और अब मौत से डर तो लगता है
पर जीने की इच्छा नही करती

चाहूँ  तो अब भी ढूंढ लूं  तुमको
मगर जानता हूँ मै कि
तुम जमाने से नही बल्कि
हमारी मोहब्ब्त की 
कशिश की तपिश से हो डरती

अगर चाहूँ  तो अब भी  
बाँध लूँ चाहत से तुम्हे
पर कहता है दिल कि
जब यार को नही है सलीका मोहब्ब्त का
तो कर दे आजाद उसे यादो से भी अपनी। 


 लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी

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