Tuesday, 18 February 2014

नादान 

कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुपचाप देखता हूँ सब कुछ 
क्योंकि जमाने को अब मै  
कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ 

आँखे सब देखती है पर 
जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि बेगानो के इस जंगल में 
कोई अपनी सी आवाज़ अब आती नही 
ख़ामोशी की जुबान मै शायद 
कुछ कुछ जानने लगा  हूँ

और इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
 कोई शक्ल भी अब पहचान में आती नही 
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ

कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
जिन्दगी की शाम हो गयी है
नही जानता कि 
इस बात पर हँसू या रोऊँ  कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ   II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

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