Saturday, 25 November 2023

आईना

अन्धो के इस शहर में 
दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में 
आवाज भी लगाने को मन नही करता
दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और देखकर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद से ही घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में बिखरे है
अवशेष कुछ टूटे सपनो के
करके याद उन सपनो को
मै खुद ही सहम जाता हूँ

नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी 
आशा के गीत गुनगुनाये थे
करके याद हश्र उन गीतों का
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ

नही चाहता की मिले आँखे
मेरी उन आँखों से क्योंकि 
छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों मै
उन सवालों के जवाब
 मै खुद को नहीं दे पाता हूँ

और इस तरह घबराकर मै
 फेंककर तोढ़ देता हूँ  आइना
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकढ़ो में
 मै अब भी उसी चेहरे को ही मौजूद पाता हूँ

अब आता समझ की नहीं है
 हल भागना किसी समस्या का
समेटकर उन टुकढ़ो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का 
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

यादे

मोढ़ 

आज फिर कुछ बीते पल याद आ गए 
आज फिर वो गुजरे कल हमे रुला गये 
आज फिर तुम्हारी यादो की खुश्बो  ने हमे महका दिया 
आज फिर तुम्हारे चहेरे के नूर ने हमे बहका दिया 

कुछ पल के लिए हम आज को भूल गये 
कुछ पल के लिए हम रिश्तो पर लगे दाग को भूल गए 
भूल गये कुछ पल के लिए की बेवफा हो तुम 
भूल गये कुछ पल के लिए की हो गयी शाम जिस की वो सुबह हो तुम 

की थी जब बेवफाई तुमने तब शायद इतना नहीं रोये थे हम
समझोगी हमारी वफ़ा को इन्ही ख्यालो मै खोये थे हम
फिर बीतते समय की धूल ने उन यादो को छुपा दिया
फिर दिल के आइने मै उभरे नए चहेरो ने तुम्हारे अक्स को भी छुपा दिया

न जाने हुआ क्या आज जो तुम याद आ गयी 
न जाने आज क्यों जीवन के इस मोढ़ पर तुम हमसे टकरा गयी
भूल गए थे जिन पलो को हम 
उन भूली बिसरी यादों को क्यों याद करा गयी

इस मोढ़ पर जब हो गयी हमारे तुम्हारे जीवन की शाम
करके याद अपनी बेवफाई शायद तुम घबरा गयी
देने को सफाई अपनी आखरी पल मै अब आ गयी 

मगर दे पायगो क्या वापिस उन फूलो को 
जो तुमने पैरो के नीचे कुचल दिए
दोगे दिलासा हमे अब क्या इस अंतिम मोढ़ पर
 क्योंकि  हम कहके अलविदा  अब तो चल दिए II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी