Saturday, 22 March 2014

ख़ामोशी

हमने अब अपनों के बीच भी
अकेले रहना सीख लिया है
उनकी बेवफाई पर वफ़ा का चेहरा लगाकर 
अब दिल को समझाना सीख लिया है

न वो कुछ कहते है न मै कुछ कहता हूँ
पर खामोशी से बाते बनाना सीख लिया है
ये तो हद हो गयी हमारी तन्हाई की
कि वीराने में महफिल सजाना सीख लिया है

हो जाती है जब वीरान भी राहे उनके घर की
तब भी खड़े  इन्तजार में उनके
गली की मद्दम रौशनी में
पेड़ो की परछाइयो से
उनके अक्स बनाना सीख लिया है

काश हम इजहारे मोहब्ब्त कर पाते
काश तुम अपनी खामोशी से बाहर आ पाते
मगर शायद तुमने सब जानकर भी
अनजान बन जाना सीख लिया है   II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी


Wednesday, 12 March 2014

नादान बालक 
चारो तरफ की हवाएं मैली हो चुकी है 
पानी की रंगत मटमैली हो चुकी है 
हो गई है कढ़वी गंडेरिया 
गंगा की धार अब मैली हो चुकी है 

हो चुका है इतना  दोहन माँ वसुंधरा का
की माँ की छाती अब खाली हो चुकी है
कर दिया है तार तार आंचल इतना माँ का (OZONE LAYER)
की छनती थी सूर्य की किरने वहां से
वो किरने अब कसैली हो चुकी है

कभी गलाकर खुद को
यह हिम शिलाए देती थी 
पानी की संजीवनी इन्सान को
वोही धार अब बनकर बाढ़
कैसी तूफानी हो चुकी है

ऐ ! धरती पुत्रो
माँ का इशारा समझो अब तो
बनकर नादान मत नोचो उसको
समझो कुछ फर्ज अपना भी
कर दो फिर से हरा भरा
माँ  वसुंधरा  के  आँचल को 
कही फट गयी गुस्से से माँ 
मत कहना फिर यह की नहीं था पता हमको 
की माँ इतनी विषैली हो चुकी है II

लेखक प्रवीण चन्द्र झांझी 
हल 
दुनिया की इस भीड़  में
मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और देखकर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद से ही घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में है बिखरे
अवशेष कुछ टूटे सपनो के
और अरमान  छितरे छितरे 
करके याद उन सपनो को
मै खुद से ही सहम जाता हूँ

मन ये भी नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी आशा के गीत गुनगुनाये थे
और उन गीतो में मिलन के तराने गाये 
पर करके याद हश्र उन गीतों का
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ
दुनिया की इस भीड़ में, मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ

डरता हूँ नही चाहता कि 
मिले मेरी आँखे भी उन आँखों से क्योंकि 
छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों मै
है दिल में उनके, अवशेष कुछ टूटे वादो के 


और उन सवालों के जवाब मै खुद को ही नहीं दे पाता हूँ
फिर इससे घबराकर मै फेंककर आइना ही तोड़ जाता हूँ  
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकडो में
अब भी उसी चेहरे को मौजूद पाता हूँ
अपनी उन भूली बिसरी यादो से मै 
अब भी कंहा निजात पाता हूँ 


अब आता समझ की नहीं है
भागना  हल नही है किसी समस्या का
करना होगा जब तक है जीवन 
तब तक पीछा लक्ष्य का 

और तब  समेटकर उन टुकडो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का 
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  
और अब मै देखकर चेहरा अपना 
खुद से नही घबराता हूँ II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   
 
मृगतृष्णा 
परदेश मै रहकर देश की मिटटी सुनहरी लगती है 
रेगिस्तान मै कंटीली झाड़ी न्यारी लगती है 
शहर मै आकर गाँव की गलियां प्यारी लगती है 
गाँव मै रहकर शहर की लडकिया सुक्मारी लगती है 
बूढ़े पेढ़ को अपनी जड़े प्यारी लगती है 
होती है कमी जब तक किसी चीज की
वो तब तक ही प्यारी लगती है
मिल जाती है जब वोही चीज तो
अपनी चाहत बेमानी लगती है
भागते भागते इस मृगतृष्णा के पीछे
इंसान को अपनी जिन्दगी गवानी पडती है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

सहर 

न तो हूँ मैं जलती हुई आग,
जिससे कि तुम जल जाओ
 न ही हूँ मै बुझी हुईं राख
जिसे की तुम भूल जाओ

मैं तो हूँ बस एक गीली जलती हुई लकड़ी  ,
मेरे जलाए जाने  का एहसास  
मुझे बुझने नहीं  देता,
और तुम्हे मेरे जलने का अहसास 
कभी  सोने  नहीं  देता ,
मै रात  भर जलकर भी बुझ  नहीं पाया ,
मुझे  देखकर  जलता  
 रात भर  तुम्हे न नींद आयी और न करार आया  ,
और बस इसी कशमश मे जिन्दगी की सहर हो गयी।  

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 
कोई  बात

मेरे लब जरा से क्या हिले
    कि ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
                     तो कहीं बात ही नही हुई  

मेरी नफरत को तो देखा सारे जहाँ ने 
 मगर कितनी करते थे हम  मुहब्बत 
      इसकी तो कही बात ही  नहीं हुई 

उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
  कि कैसे  हुए हम बर्बाद
    पर  कितनो को किया  हमने आबाद 
          इसकी  तो कही बात ही नहीं हुई

हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
     चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
       मगर कैसे गुजारी है हमने  रात
         इसकी  तो कही कोई बात  नहीं हुई

अरे! आ जाते कभी तो तुम हमारे पास
  और रखकर कांधे पर मेरे हाथ
   महज  कह देते बस इतनी सी बात
     मत घबरा मै हूँ तुम्हारे साथ
तो शायद हम भी कह पाते सकून के साथ 
   चलो यह तो कोई बात भी हुई

                         लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी  

Tuesday, 11 March 2014

गुजरी राहें

उड़ते  थे कभी हम भी होकर सवार 
 कल्पना के तेज घोड़े पर
  सोते थे हसीन सपनो के संग 
    और पड़ते  नहीं थे पावं जमीन पर, 

  समय के चक्रवात में आकर 
    कुछ इस तरह फंसे 
     हालात के रेगिस्तान में जाकर 
         
कि अब यह आलम है 
 न कोई तमन्ना है,  न कोई आकांक्षा है 
  और न ही कोई सपना है   
  मुड़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
     तो मिलते नही अपने पैरो के निशान भी उनपर
       तो कैसे कह दे कि जंहा में कोई अपना है।  
.
                    लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी 
मन की गुत्थी 
   
बादल की तरह कभी आती हो,
      धुन्ध  बनकर कभी लिपट जाती हो
                धूप बनकर कभी चमकती हो
                    सूरज सी कभी गरमा जाती हो
मन पीछे हटने नहीं देता
    तुम आगे बढ़ने का साहस नहीं देती
              मै तो हूँ  हैरान परेशान
                कि तुमसे कुछ कहने की हिम्मत क्यों नहीं होती 
शायद तुम्हारी  न का डर
      कही मुझे डरा जाता है
        तुम्हारे रूठ कर दूर होने का डर
          मुझे दहला जाता है 

काश कुछ तुम कहती
   कुछ मै समझ पाता
     तो न जुदाई की नौबत आती 
        और हमारी प्यार जीत जाता  
     
मगर फिर भी मुझे खुश करने के लिए तो
 यह एहसास ही है काफी 
      कि कुछ तो है हमारे बीच अभी भी बाकी 
          जो कही न कही हमे आपस में जोड़ता है 
            एक आशा की किरण से मुझे झंझोरता है  
               
     कि कभी तो तुम आओगी 
      खोलकर अपने मन की गुत्थी 
        मुझे ये समझाओगी 
          कि तुम्हारी नजरे तो बोलती रही पर तुम्हारी जुबान क्यों थी मौन  
              न तो हम तुम्हारे अपने है और न पराये 
              तो  आखिर हम आपके है कौन ?


                लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

Monday, 10 March 2014

    स्वार्थी 

बनाया था शाहजहाँ ने 
   याद में मुमताज के एक ताज 
      शायद अपने पर उसको नहीं था यह विश्वास
                 कि बाद मरने के भी कर पायेगा वो उसे प्यार
और मेने भी दिल में अपने   बनाया है  इक ताज
     हो जायगा जो जलकर संग मेरे इक दिन राख
     स्वार्थी हु मै शायद इतना कि चाहता नहीं ये बात
          के बाद मरने के भी मेरे करे कोई तुमको याद. 

              लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 
कल्पना की एक मंजिल

शिमला के माल रोड पर जिन्दगी चहक रही थी 
  बचपन खेल रहा था जवानी दौड़ रही थी 
    अधेढ़ अवस्था ठहर गई थी और बुढ़ापा सहम गया था 
    
 मै सतब्ध सा रह गया जब आसमान से बादल उतरें 
    और नीचे घाटी में बिखर गए, 
      मै परेशान था कि अब कल्पना में उढ़कर किसे पकडूँगा 

 क्योंकि बादलो के पार ही तो मै एक शून्य सा आसमान देखता हूँ
  और उस शून्य में मै अपनी मंजिल की राह देखता हूँ 
    मगर बादलो ने उतर कर मेरी सपनो की दुनिया ही बेमानी कर दी   
     शायद अब तलाशनी होगी मुझे जीने के लिए 
       एक कल्पना की एक नई मंजिल.

                                      लेखक : प्रवीन चन्द्र झांजी
   खोज 
नदी के किनारे, पहाड़ पर उगें एक पेड़ की डाली के पत्ते ,
झुक कर बहते पानी को छूने की कोशिश करते  है, 
मगर फिर डर जाते  है, 
ठीक उन नटखट बालको की तरह, 
जो आग को छूने की कोशश तो करते है,
मगर उसकी तेजी से डर जाते है.
मगर भूल जाती है ये डाली , भूल जाती है उसके  ये पत्ते
 की अंत में सूखकर एक दिन एक हवा के झोंके ने 
गिरा देना है उन्हें  इसी नदी में
और उन्हें बहकर नदी की धारा में , 
चल देना होगा एक नई राह पे 
खोजने अपनी नई मंजिल  ,
एक अनजान सागर की गोद  में.         


लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी  
एक वेश्या कि हार

जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर  तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है  


क्योंकि जिन्दगी तो है एक वेश्या कि तरह
   कभी हसंती कभी इतराती पास अपने बुलाती है
    कभी हसांती कभी रुलाती और कभी रूठ जाती है  
    मौत है पतिव्रता नारी
     एक बार जो आ जाए तो फिर कही नहीं जाती है
 जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

जिन्दगी चढ़ा था कोठे पर तेरे 
लेकर अरमान और हसीन सपने 
खूब भटकाया बहलाया फुसलाया तूने 
मगर अब है ये आलम 
कि आई जब जाने की बारी
तो  नहीं है कुछ पास अपने
और मौत है इतनी भोली   
कि  फिर ले  लिया मुझको आँचल में उसने अपने
 जबकि है पास मेरे  
सिर्फ कुछ भूली सी यादें या है कुछ टूटे सपने                
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर  तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

जिन्दगी आया था जब पास तेरे 
था एक सुंदर बढ़ता शरीर पास मेरे
कुछ  जिन्दादिली के अरमान थे
और थे कुछ कर दीखाने के सपने
खूब नाच दिखाए तुने
खूब आँचल लहराए अपने
कभी झन झन करके आई
कभी छुप गयी दिखाकर जलवे अपने   
खूब ललचाया भरमाया हमको  बजाकर घुंघरू अपने
 मगर अब जब हूँ मै लाचार बेकार 
तो उत्तार दिया मुझको कोठे से तूने अपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर  तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

पर है मौत अर्धांगनी मेरी
करती है मुझको अब भी अंगीकार
बूढ़ा हूँ लाचार शक्तिहीँन हूँ 
करती है फिर भी मुझको वो आज भी स्वीकार 
समेटती है बाँहों मै अपनी किया नहीं मुझको  निराश 
इसलिए  जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर  तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

याद रखना थका हुआ हूँ हारा नहीं हूँ
 परेशांन हूँ मगर बेचारा नहीं हूँ
तेरे जुल्मो से झुका  हुआ हूँ दुखियारा नहीं हूँ
एक दिन सबक जरूर तुम्हे सिखाऊंगा
जायूँगा जब पास मौत के तुझे साथ लेकर जायूँगा
सामने दुनिया के देखना
इस वेश्या को पत्नी से जरूर हरवाऊंगा
जिन्दगी(वेश्या) बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

                  लेखक प्रवीन चन्द्र  झांजी 

      
 पहचान

ऐ ज़माने मत कर जुलम इतना
    की तेरा जुलम हद से गुजर जाय
याद रखो की हद की दुनिया के पार
   कुछ ऐसे सिरफिरे इन्सान होते है
वो खुद मै होते है तनहा इतने
  की वो खुद ही खुद के भगवान होते है
अरे क्या मारेगा कोई उनको
  वो तो खुद ही चलते फिरते शमशान होते है
जो उठाये फिरते है राख
   कुछ यादों की अधजली लाशो की
बस उनकी पहचान तो 
उनके कदमो के निशान होते है II 

                      लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी
          
  किस्मत फूल की

बदकिस्मत है वो फूल 
   जो गिरकर किसी डाली से 
     बन गया शरदा सुमन किसी शव का 

खुश किस्मत है वो फूल 
   जो टूटा तो किसी डाली से 
      मगर सजकर किसी दुल्हन के जुढ़े मै महक गया

है फितरत फूल की बिखेरना सुगंध
   चाहे वो छुपाये दुर्गन्ध किसी शव की
     या किसी दुल्हन के रूप को महकाने की हो

खोकर  सुगंध कुचला जाना है नियति उसकी
   वो बिस्तर किसी दुल्हन का हो
      या फिर जगह किसी शव के दफ़नाने की हो

गुजरती क्या होगी
  उस  टूटे मुरझाये तनहा फूल पर
     इसकी चिंता क्यों इस बदगुमान ज़माने को हो

है ज़माने की नज़र मै
     फूल की किस्मत यही
          फिर दुःख क्यों उसके टूट कर  कुम्लाह्कर  मुरझा जाने मै हो 

                              लेखक  प्रवीन चन्द्र  झांझी