Monday, 3 March 2014

मृगतृष्णा 
परदेश मै रहकर देश की मिटटी सुनहरी लगती है 
रेगिस्तान मै कंटीली झाड़ी न्यारी लगती है 
शहर मै आकर गाँव की गलियां प्यारी लगती है 
गाँव मै रहकर शहर की लडकिया सुक्मारी लगती है 
बूढ़े पेढ़ को अपनी जड़े प्यारी लगती है 

होती है कमी जब तक किसी चीज की
वो तब तक ही प्यारी लगती है
मिल जाती है जब वोही चीज तो
अपनी चाहत बेमानी लगती है
भागते भागते इस मृगतृष्णा के पीछे
इंसान को अपनी जिन्दगी गवानी पडती है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

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