एक वेश्या कि हार
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
क्योंकि जिन्दगी तो है एक वेश्या कि तरह
कभी हसंती कभी इतराती पास अपने बुलाती है
कभी हसांती कभी रुलाती और कभी रूठ जाती है
मौत है पतिव्रता नारी
एक बार जो आ जाए तो फिर कही नहीं जाती है
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी चढ़ा था कोठे पर तेरे
लेकर अरमान और हसीन सपने
खूब भटकाया बहलाया फुसलाया तूने
मगर अब है ये आलम
कि आई जब जाने की बारी
तो नहीं है कुछ पास अपने
और मौत है इतनी भोली
कि फिर ले लिया मुझको आँचल में उसने अपने
जबकि है पास मेरे
सिर्फ कुछ भूली सी यादें या है कुछ टूटे सपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी आया था जब पास तेरे
था एक सुंदर बढ़ता शरीर पास मेरे
कुछ जिन्दादिली के अरमान थे
और थे कुछ कर दीखाने के सपने
खूब नाच दिखाए तुने
खूब आँचल लहराए अपने
कभी झन झन करके आई
कभी छुप गयी दिखाकर जलवे अपने
खूब ललचाया भरमाया हमको बजाकर घुंघरू अपने
मगर अब जब हूँ मै लाचार बेकार
तो उत्तार दिया मुझको कोठे से तूने अपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
पर है मौत अर्धांगनी मेरी
करती है मुझको अब भी अंगीकार
बूढ़ा हूँ लाचार शक्तिहीँन हूँ
करती है फिर भी मुझको वो आज भी स्वीकार
समेटती है बाँहों मै अपनी किया नहीं मुझको निराश
इसलिए जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
याद रखना थका हुआ हूँ हारा नहीं हूँ
परेशांन हूँ मगर बेचारा नहीं हूँ
तेरे जुल्मो से झुका हुआ हूँ दुखियारा नहीं हूँ
एक दिन सबक जरूर तुम्हे सिखाऊंगा
जायूँगा जब पास मौत के तुझे साथ लेकर जायूँगा
सामने दुनिया के देखना
इस वेश्या को पत्नी से जरूर हरवाऊंगा
जिन्दगी(वेश्या) बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
लेखक प्रवीन चन्द्र झांजी
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
क्योंकि जिन्दगी तो है एक वेश्या कि तरह
कभी हसंती कभी इतराती पास अपने बुलाती है
कभी हसांती कभी रुलाती और कभी रूठ जाती है
मौत है पतिव्रता नारी
एक बार जो आ जाए तो फिर कही नहीं जाती है
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी चढ़ा था कोठे पर तेरे
लेकर अरमान और हसीन सपने
खूब भटकाया बहलाया फुसलाया तूने
मगर अब है ये आलम
कि आई जब जाने की बारी
तो नहीं है कुछ पास अपने
और मौत है इतनी भोली
कि फिर ले लिया मुझको आँचल में उसने अपने
जबकि है पास मेरे
सिर्फ कुछ भूली सी यादें या है कुछ टूटे सपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी आया था जब पास तेरे
था एक सुंदर बढ़ता शरीर पास मेरे
कुछ जिन्दादिली के अरमान थे
और थे कुछ कर दीखाने के सपने
खूब नाच दिखाए तुने
खूब आँचल लहराए अपने
कभी झन झन करके आई
कभी छुप गयी दिखाकर जलवे अपने
खूब ललचाया भरमाया हमको बजाकर घुंघरू अपने
मगर अब जब हूँ मै लाचार बेकार
तो उत्तार दिया मुझको कोठे से तूने अपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
पर है मौत अर्धांगनी मेरी
करती है मुझको अब भी अंगीकार
बूढ़ा हूँ लाचार शक्तिहीँन हूँ
करती है फिर भी मुझको वो आज भी स्वीकार
समेटती है बाँहों मै अपनी किया नहीं मुझको निराश
इसलिए जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
याद रखना थका हुआ हूँ हारा नहीं हूँ
परेशांन हूँ मगर बेचारा नहीं हूँ
तेरे जुल्मो से झुका हुआ हूँ दुखियारा नहीं हूँ
एक दिन सबक जरूर तुम्हे सिखाऊंगा
जायूँगा जब पास मौत के तुझे साथ लेकर जायूँगा
सामने दुनिया के देखना
इस वेश्या को पत्नी से जरूर हरवाऊंगा
जिन्दगी(वेश्या) बहुत थक गया हू मै लड़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
लेखक प्रवीन चन्द्र झांजी
No comments:
Post a Comment