कोई बात
मेरे लब जरा से क्या हिले
कि ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
तो कहीं बात ही नही हुई
मेरी नफरत को तो देखा सारे जहाँ ने
मगर कितनी करते थे हम मुहब्बत
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
कि कैसे हुए हम बर्बाद
पर कितनो को किया हमने आबाद
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
मगर कैसे गुजारी है हमने रात
इसकी तो कही कोई बात नहीं हुई
अरे! आ जाते कभी तो तुम हमारे पास
और रखकर कांधे पर मेरे हाथ
महज कह देते बस इतनी सी बात
मत घबरा मै हूँ तुम्हारे साथ
तो शायद हम भी कह पाते सकून के साथ
चलो यह तो कोई बात भी हुई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
कि ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
तो कहीं बात ही नही हुई
मेरी नफरत को तो देखा सारे जहाँ ने
मगर कितनी करते थे हम मुहब्बत
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
कि कैसे हुए हम बर्बाद
पर कितनो को किया हमने आबाद
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
मगर कैसे गुजारी है हमने रात
इसकी तो कही कोई बात नहीं हुई
अरे! आ जाते कभी तो तुम हमारे पास
और रखकर कांधे पर मेरे हाथ
महज कह देते बस इतनी सी बात
मत घबरा मै हूँ तुम्हारे साथ
तो शायद हम भी कह पाते सकून के साथ
चलो यह तो कोई बात भी हुई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment