Wednesday, 12 March 2014

कोई  बात

मेरे लब जरा से क्या हिले
    कि ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
                     तो कहीं बात ही नही हुई  

मेरी नफरत को तो देखा सारे जहाँ ने 
 मगर कितनी करते थे हम  मुहब्बत 
      इसकी तो कही बात ही  नहीं हुई 

उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
  कि कैसे  हुए हम बर्बाद
    पर  कितनो को किया  हमने आबाद 
          इसकी  तो कही बात ही नहीं हुई

हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
     चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
       मगर कैसे गुजारी है हमने  रात
         इसकी  तो कही कोई बात  नहीं हुई

अरे! आ जाते कभी तो तुम हमारे पास
  और रखकर कांधे पर मेरे हाथ
   महज  कह देते बस इतनी सी बात
     मत घबरा मै हूँ तुम्हारे साथ
तो शायद हम भी कह पाते सकून के साथ 
   चलो यह तो कोई बात भी हुई

                         लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी  

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