गुजरी राहें
उड़ते थे कभी हम भी होकर सवार
कल्पना के तेज घोड़े पर
सोते थे हसीन सपनो के संग
और पड़ते नहीं थे पावं जमीन पर,
समय के चक्रवात में आकर
कुछ इस तरह फंसे
हालात के रेगिस्तान में जाकर
कि अब यह आलम है
न कोई तमन्ना है, न कोई आकांक्षा है
और न ही कोई सपना है
मुड़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
तो मिलते नही अपने पैरो के निशान भी उनपर
तो कैसे कह दे कि जंहा में कोई अपना है।
.
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
उड़ते थे कभी हम भी होकर सवार
कल्पना के तेज घोड़े पर
सोते थे हसीन सपनो के संग
और पड़ते नहीं थे पावं जमीन पर,
समय के चक्रवात में आकर
कुछ इस तरह फंसे
हालात के रेगिस्तान में जाकर
कि अब यह आलम है
न कोई तमन्ना है, न कोई आकांक्षा है
और न ही कोई सपना है
मुड़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
तो मिलते नही अपने पैरो के निशान भी उनपर
तो कैसे कह दे कि जंहा में कोई अपना है।
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लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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