Tuesday, 11 March 2014

गुजरी राहें

उड़ते  थे कभी हम भी होकर सवार 
 कल्पना के तेज घोड़े पर
  सोते थे हसीन सपनो के संग 
    और पड़ते  नहीं थे पावं जमीन पर, 

  समय के चक्रवात में आकर 
    कुछ इस तरह फंसे 
     हालात के रेगिस्तान में जाकर 
         
कि अब यह आलम है 
 न कोई तमन्ना है,  न कोई आकांक्षा है 
  और न ही कोई सपना है   
  मुड़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
     तो मिलते नही अपने पैरो के निशान भी उनपर
       तो कैसे कह दे कि जंहा में कोई अपना है।  
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                    लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी 

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