खोज
नदी के किनारे, पहाड़ पर उगें एक पेड़ की डाली के पत्ते ,
झुक कर बहते पानी को छूने की कोशिश करते है,
मगर फिर डर जाते है,
ठीक उन नटखट बालको की तरह,
जो आग को छूने की कोशश तो करते है,
मगर उसकी तेजी से डर जाते है.
मगर भूल जाती है ये डाली , भूल जाती है उसके ये पत्ते
की अंत में सूखकर एक दिन एक हवा के झोंके ने
गिरा देना है उन्हें इसी नदी में
और उन्हें बहकर नदी की धारा में ,
चल देना होगा एक नई राह पे
खोजने अपनी नई मंजिल ,
एक अनजान सागर की गोद में.
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
नदी के किनारे, पहाड़ पर उगें एक पेड़ की डाली के पत्ते ,
झुक कर बहते पानी को छूने की कोशिश करते है,
मगर फिर डर जाते है,
ठीक उन नटखट बालको की तरह,
जो आग को छूने की कोशश तो करते है,
मगर उसकी तेजी से डर जाते है.
मगर भूल जाती है ये डाली , भूल जाती है उसके ये पत्ते
की अंत में सूखकर एक दिन एक हवा के झोंके ने
गिरा देना है उन्हें इसी नदी में
और उन्हें बहकर नदी की धारा में ,
चल देना होगा एक नई राह पे
खोजने अपनी नई मंजिल ,
एक अनजान सागर की गोद में.
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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