Monday, 10 March 2014

    अतृप्त आकांशा 
जाती हो भूल जब मर्यादाए ज़माने की 
     भिखर जाती हो ऊपर मेरे बनकर ग्रीषम रात की चांदनी सी 
करती हो याद जब मर्यादा समाज की 
         ठिठुर जाती हो शरद ऋतू धूप सी 
लाने को मुझे भी उन मर्यादाओ मै समाज की 
      डरा देती हो मुझको चमक कर बिजली सी बरसात की 
चलती रही जो कश म कश इसी तरह
       तो तह उम्र हम इस रिश्ते को कोई नाम न दे सकेंगे
बिना जोढ़े या तोढ़े इस बेनाम रिश्ते को
   बिछढ़ जायगे हम शायद किसी दिन एक अँधेरे मोढ़ पर
मगर है यह आकांशा दिल की
    शायद किसी और युग मै किसी और जमीन पर
कभी हम इस अनाम रिश्ते को
                    कोई नाम दे सके


                                  लेखक   प्रवीन चन्द्र  झांझी        

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