Wednesday, 12 March 2014

हल 
दुनिया की इस भीड़  में
मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और देखकर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद से ही घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में है बिखरे
अवशेष कुछ टूटे सपनो के
और अरमान  छितरे छितरे 
करके याद उन सपनो को
मै खुद से ही सहम जाता हूँ

मन ये भी नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी आशा के गीत गुनगुनाये थे
और उन गीतो में मिलन के तराने गाये 
पर करके याद हश्र उन गीतों का
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ
दुनिया की इस भीड़ में, मै कभी कभी खुद को
खुद से अजनबी पाता हूँ

डरता हूँ नही चाहता कि 
मिले मेरी आँखे भी उन आँखों से क्योंकि 
छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों मै
है दिल में उनके, अवशेष कुछ टूटे वादो के 


और उन सवालों के जवाब मै खुद को ही नहीं दे पाता हूँ
फिर इससे घबराकर मै फेंककर आइना ही तोड़ जाता हूँ  
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकडो में
अब भी उसी चेहरे को मौजूद पाता हूँ
अपनी उन भूली बिसरी यादो से मै 
अब भी कंहा निजात पाता हूँ 


अब आता समझ की नहीं है
भागना  हल नही है किसी समस्या का
करना होगा जब तक है जीवन 
तब तक पीछा लक्ष्य का 

और तब  समेटकर उन टुकडो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का 
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  
और अब मै देखकर चेहरा अपना 
खुद से नही घबराता हूँ II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   
 

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