Monday, 10 March 2014

    स्वार्थी 

बनाया था शाहजहाँ ने 
   याद में मुमताज के एक ताज 
      शायद अपने पर उसको नहीं था यह विश्वास
                 कि बाद मरने के भी कर पायेगा वो उसे प्यार
और मेने भी दिल में अपने   बनाया है  इक ताज
     हो जायगा जो जलकर संग मेरे इक दिन राख
     स्वार्थी हु मै शायद इतना कि चाहता नहीं ये बात
          के बाद मरने के भी मेरे करे कोई तुमको याद. 

              लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

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