Wednesday, 12 March 2014

सहर 

न तो हूँ मैं जलती हुई आग,
जिससे कि तुम जल जाओ
 न ही हूँ मै बुझी हुईं राख
जिसे की तुम भूल जाओ

मैं तो हूँ बस एक गीली जलती हुई लकड़ी  ,
मेरे जलाए जाने  का एहसास  
मुझे बुझने नहीं  देता,
और तुम्हे मेरे जलने का अहसास 
कभी  सोने  नहीं  देता ,
मै रात  भर जलकर भी बुझ  नहीं पाया ,
मुझे  देखकर  जलता  
 रात भर  तुम्हे न नींद आयी और न करार आया  ,
और बस इसी कशमश मे जिन्दगी की सहर हो गयी।  

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 

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