सहर
न तो हूँ मैं जलती हुई आग,
जिससे कि तुम जल जाओ
न ही हूँ मै बुझी हुईं राखजिसे की तुम भूल जाओ
मैं तो हूँ बस एक गीली जलती हुई लकड़ी ,
मेरे जलाए जाने का एहसास
मुझे बुझने नहीं देता,
और तुम्हे मेरे जलने का अहसास
और तुम्हे मेरे जलने का अहसास
कभी सोने नहीं देता ,
मै रात भर जलकर भी बुझ नहीं पाया ,
मुझे देखकर जलता
मुझे देखकर जलता
रात भर तुम्हे न नींद आयी और न करार आया ,
और बस इसी कशमश मे जिन्दगी की सहर हो गयी।
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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