Monday, 10 March 2014

कल्पना की एक मंजिल

शिमला के माल रोड पर जिन्दगी चहक रही थी 
  बचपन खेल रहा था जवानी दौड़ रही थी 
    अधेढ़ अवस्था ठहर गई थी और बुढ़ापा सहम गया था 
    
 मै सतब्ध सा रह गया जब आसमान से बादल उतरें 
    और नीचे घाटी में बिखर गए, 
      मै परेशान था कि अब कल्पना में उढ़कर किसे पकडूँगा 

 क्योंकि बादलो के पार ही तो मै एक शून्य सा आसमान देखता हूँ
  और उस शून्य में मै अपनी मंजिल की राह देखता हूँ 
    मगर बादलो ने उतर कर मेरी सपनो की दुनिया ही बेमानी कर दी   
     शायद अब तलाशनी होगी मुझे जीने के लिए 
       एक कल्पना की एक नई मंजिल.

                                      लेखक : प्रवीन चन्द्र झांजी

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