कल्पना की एक मंजिल
शिमला के माल रोड पर जिन्दगी चहक रही थी
बचपन खेल रहा था जवानी दौड़ रही थी
अधेढ़ अवस्था ठहर गई थी और बुढ़ापा सहम गया था
मै सतब्ध सा रह गया जब आसमान से बादल उतरें
और नीचे घाटी में बिखर गए,
मै परेशान था कि अब कल्पना में उढ़कर किसे पकडूँगा
क्योंकि बादलो के पार ही तो मै एक शून्य सा आसमान देखता हूँ
और उस शून्य में मै अपनी मंजिल की राह देखता हूँ
मगर बादलो ने उतर कर मेरी सपनो की दुनिया ही बेमानी कर दी
शायद अब तलाशनी होगी मुझे जीने के लिए
एक कल्पना की एक नई मंजिल.
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांजी
शिमला के माल रोड पर जिन्दगी चहक रही थी
बचपन खेल रहा था जवानी दौड़ रही थी
अधेढ़ अवस्था ठहर गई थी और बुढ़ापा सहम गया था
मै सतब्ध सा रह गया जब आसमान से बादल उतरें
और नीचे घाटी में बिखर गए,
मै परेशान था कि अब कल्पना में उढ़कर किसे पकडूँगा
क्योंकि बादलो के पार ही तो मै एक शून्य सा आसमान देखता हूँ
और उस शून्य में मै अपनी मंजिल की राह देखता हूँ
मगर बादलो ने उतर कर मेरी सपनो की दुनिया ही बेमानी कर दी
शायद अब तलाशनी होगी मुझे जीने के लिए
एक कल्पना की एक नई मंजिल.
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांजी
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