Tuesday, 4 March 2014

हल 
दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को खुद से अजनबी पाता हूँ
देखकर आइने में चेहरा अपना
और उसपर फैली लकीरे चिन्ताओ की
मै खुद ही खुद से घबरा जाता हूँ

नही चाहता हूँ पहचानना इस चेहरे को
क्योंकि इन लकीरों में बिखरे है
अवशेष कुछ टूटे सपनो के कुछ धुंधली यादो के 
और करके याद उन सपनो को मै खुद ही सहम जाता हूँ
और दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को खुद से अजनबी पाता हूँ

नही चाहता की हिले होंठ इस चेहरे के
कयोंकि इन होंठो ने कभी 
आशा के गीत गुनगुनाये थे और खुशियो के तराने गाये थे 
करके याद हश्र उन गीतों का 
मै सिर से पावं तक सिहर जाता हूँ
और नही चाहता की मिले आँखे मेरी उन आँखों से 
क्योंकि छुपे है कुछ सवाल अनसुलझे उन आँखों में 
कि कैसे टूटे वो सपने
उन सवालों के जवाब मै खुद को भी नहीं दे पाता हूँ
दुनिया की इस भीढ़ में
मै कभी कभी खुद को खुद से अजनबी पाता हूँ

घेर लेते है ये सब चारो ओर से 
तो घबराकर मै फेंककर आइना ही तोढ़ जाता हूँ
मगर उस टूटे हुएं आइने के टुकढ़ो में भी 
मै अब भी उसी चेहरे को मौजूद पाता हूँ 
पलट कर देखता हूँ जब अतीत को 
तो उन प्रश्नो से अपना पीछा नही छुड़ा पाता  हूँ 


अब आता समझ की नहीं है
 हल भागना किसी समस्या का
समेटकर उन टुकढ़ो को
 देने को जवाब उन सवालों का
पहचानने को चेहरा खुद का 
मै एक नया आइना लेने निकल जाता हूँ  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   

No comments:

Post a Comment