बदलते रंग (CHANGING COLOURS)
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे रात को दिन और दिन को रात किया करते थे जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
यह तो थी नजाकत हालात की जिसने हमे सहमा दिया वर्ना कब हम वक़त की परवाह किया करते थे जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
घिरे रहते थे कभी रकीबो से हम तन्हाई को हम तलाशा करते थे अब यह आलम हें की मै हूँ और मेरी तन्हाई हें ऐसे हालातो के तो ख्याल से भी डरा करते थे जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
जिन्दगी हें गुजारिश बस इतनी छोड़ोगी जब हमे आखरी मंजिल पे अपनी कह देना बस तुम इतना
नहीं था तनहा सदा मै इतना
कभी रकीबो की महफिल कि हम शमा हुआ करते थे
कभी रकीबो की महफिल कि हम शमा हुआ करते थे
कभी जिन्दा दिली से हम भी जिया करते थे
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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