Wednesday, 30 October 2024

पहला प्यार

दिल का वो कोना जो तुम से बिछड़ने के बाद ही बंद हो गया था 
वो फिर कभी किसी और के लिए खुल न सका 
जमाना कहता है कि हमे दिल की बिमारी हो गयी है 
नादान है वो जानता ही नहीं कि 
दिल के उस हिस्से पर हमारा जमाने से अख्तियार न था l
Parveen Jhanji

Tuesday, 17 September 2024

कुछ लकीरें ऐसी भी

कुछ लकीरे ऐसी भी 

कुछ आड़ी तिरछी लकीरे जो उठती है मेरे जहन में
कुछ अजीब से अक्श बना जाती है मेरे जिगर में
जब जोड़ने लगता हूँ उनको तो बिखर जाती है 
जब तकता हूँ हैरान सा उनको 
तो मेरी बेबसी पर वो खिलखिलाती है 

नही जानता क्या शक्ल लेना चाहती है वो
नही जानता की कोई है भी के नही वो 
ये भी नही जानता की कभी कोई शक्ल भी बन पायेगी 
ये भी नही जानता कि 
कभी मेरी नजर के सामने भी वो आएगी 

बस ये एक अहसास है 
जो मुझे तन्हाईयो से बचाये रखता है 
मेरी तन्हा जिंदगी में उम्मीदों की शमा जलाये रखता है
तुम लकीरे हो या शख्सियत 
ये बेमायने हे मेरे लिए
तुम कुछ भी हो बस मेरी हो
बस मेरी ये ही अहम है मेरे लिए।

निवेदक  प्रवीन झाँझी

Friday, 1 March 2024

सहर

न तू मैं हूँ जलती आग, जिससे तुम जल जाओ
 न मैं हूँ बुझी राख,जिससे तुम भूल जाओ,
 मैं तो एक एक  गीली जलती लकढ़ी हूँ,
और मेरे  जलाए   जाने  का एहसास,
मुझे  बुझने    नहीं  देता,
तुम्हे  मेरे  जलने  का  अहसास 
कभी  सोने  नहीं  देता ,
मै   रात  भर  जलकर  भी  बुझ  नहीं  पाया ,
मुझे  देखकर  जलता रात भर
तुम्हे सोने का सुख भी मिल नही   पाया,
और इसी  कशमश  मे  
जिन्दगी  की  सहर  हो  गयी ।

प्रवीन झांझी

Wednesday, 31 January 2024

वैसे ही

किस किस ने हमे इस्तेमाल नही किया
किस किस ने रिश्ते का व्यापार नही किया
अफसोस तो यह है कि 
यह तो अगर प्यार से मांगते तो हम वैसे ही दे देते l
न उन्हे शर्मिंदा होना पड़ता 
न हमे उन्हे शर्मिंदा देखना पड़ता। 

प्रवीन झाँझी

तन्हाई

तन्हाई 
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है
बोला मन कि जब तन से हो अलग उड़ जाता है मन
तब वो तन से निकली हुई एक आह होती है
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है

यादो के पंखो पर बैठ कर मन जब
अतीत के आकाश में  उड़ जाता है
कभी रोता है कुछ याद कर और
कभी खुद ब खुद मुस्कराता है
पर है ये नियति जिस्म की
 के  फिर भी होठ उसके मुस्कराते है और
आँखे भी उसी की रोती है,
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

है समुन्द्र तन्हाई का गहरा इतना कि
मन इसमें न जाने कंहा डूब जाता है
और वक़्त  की मृगतृष्णा में भटककर
जब ढूंढता है ख़ुशी के मोती इन समय की सीपियो में
तब जिस्म की इस किश्ती को
साँसों की पतवार ही  ढोती है

पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

पूछा फिर दिल ने की जब उड़ता है मन
 तो जिस्म ये तन्हाई का बोझ क्यों उठाता है
हंस कर बोल मन की 
जब आती है मिलन की बेला 
तो मिटकर जिस्म मन के साथ उड़ जाता है
जिन्दगी मौत के जब मिलती है गले 
तब हो जाता है तन्हा इतना इंसान कि 
फिर तन्हाई की गुंजाईश भी कंहा होती है
 पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से 
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

प्रवीन चन्द्र झांझी