Friday, 1 March 2024

सहर

न तू मैं हूँ जलती आग, जिससे तुम जल जाओ
 न मैं हूँ बुझी राख,जिससे तुम भूल जाओ,
 मैं तो एक एक  गीली जलती लकढ़ी हूँ,
और मेरे  जलाए   जाने  का एहसास,
मुझे  बुझने    नहीं  देता,
तुम्हे  मेरे  जलने  का  अहसास 
कभी  सोने  नहीं  देता ,
मै   रात  भर  जलकर  भी  बुझ  नहीं  पाया ,
मुझे  देखकर  जलता रात भर
तुम्हे सोने का सुख भी मिल नही   पाया,
और इसी  कशमश  मे  
जिन्दगी  की  सहर  हो  गयी ।

प्रवीन झांझी

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