तन्हाई
पूछा इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि ये तन्हाई क्या होती है
बोला मन कि जब तन से हो अलग उड़ जाता है मन
तब वो तन से निकली हुई एक आह होती है
पूछा इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि ये तन्हाई क्या होती है
यादो के पंखो पर बैठ कर मन जब
अतीत के आकाश में उड़ जाता है
कभी रोता है कुछ याद कर और
कभी खुद ब खुद मुस्कराता है
पर है ये नियति जिस्म की
के फिर भी होठ उसके मुस्कराते है और
आँखे भी उसी की रोती है,
पूछा इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि ये तन्हाई क्या होती है......................
है समुन्द्र तन्हाई का गहरा इतना कि
मन इसमें न जाने कंहा डूब जाता है
और वक़्त की मृगतृष्णा में भटककर
जब ढूंढता है ख़ुशी के मोती इन समय की सीपियो में
तब जिस्म की इस किश्ती को
साँसों की पतवार ही ढोती है
पूछा इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि ये तन्हाई क्या होती है......................
पूछा फिर दिल ने की जब उड़ता है मन
तो जिस्म ये तन्हाई का बोझ क्यों उठाता है
हंस कर बोल मन की
जब आती है मिलन की बेला
तो मिटकर जिस्म मन के साथ उड़ जाता है
जिन्दगी मौत के जब मिलती है गले
तब हो जाता है तन्हा इतना इंसान कि
फिर तन्हाई की गुंजाईश भी कंहा होती है
पूछा इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि ये तन्हाई क्या होती है......................
प्रवीन चन्द्र झांझी
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