मन की गुत्थी
बादल की तरह कभी आती हो,
धुन्ध बनकर कभी लिपट जाती हो
धूप बनकर कभी चमकती हो
सूरज सी कभी गरमा जाती हो
मन पीछे हटने नहीं देता
तुम आगे बढ़ने का साहस नहीं देती
मै तो हूँ हैरान परेशान
कि तुमसे कुछ कहने की हिम्मत क्यों नहीं होती
शायद तुम्हारी न का डर
कही मुझे डरा जाता है
तुम्हारे रूठ कर दूर होने का डर
मुझे दहला जाता है
काश कुछ तुम कहती
कुछ मै समझ पाता
तो न जुदाई की नौबत आती
और हमारी प्यार जीत जाता
मगर फिर भी मुझे खुश करने के लिए तो
यह एहसास ही है काफी
कि कुछ तो है हमारे बीच अभी भी बाकी
जो कही न कही हमे आपस में जोड़ता है
एक आशा की किरण से मुझे झंझोरता है
कि कभी तो तुम आओगी
खोलकर अपने मन की गुत्थी
मुझे ये समझाओगी
कि तुम्हारी नजरे तो बोलती रही पर तुम्हारी जुबान क्यों थी मौन
न तो हम तुम्हारे अपने है और न पराये
तो आखिर हम आपके है कौन ?
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
बादल की तरह कभी आती हो,
धुन्ध बनकर कभी लिपट जाती हो
धूप बनकर कभी चमकती हो
सूरज सी कभी गरमा जाती हो
मन पीछे हटने नहीं देता
तुम आगे बढ़ने का साहस नहीं देती
मै तो हूँ हैरान परेशान
कि तुमसे कुछ कहने की हिम्मत क्यों नहीं होती
शायद तुम्हारी न का डर
कही मुझे डरा जाता है
तुम्हारे रूठ कर दूर होने का डर
मुझे दहला जाता है
काश कुछ तुम कहती
कुछ मै समझ पाता
तो न जुदाई की नौबत आती
और हमारी प्यार जीत जाता
मगर फिर भी मुझे खुश करने के लिए तो
यह एहसास ही है काफी
कि कुछ तो है हमारे बीच अभी भी बाकी
जो कही न कही हमे आपस में जोड़ता है
एक आशा की किरण से मुझे झंझोरता है
कि कभी तो तुम आओगी
खोलकर अपने मन की गुत्थी
मुझे ये समझाओगी
कि तुम्हारी नजरे तो बोलती रही पर तुम्हारी जुबान क्यों थी मौन
न तो हम तुम्हारे अपने है और न पराये
तो आखिर हम आपके है कौन ?
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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