Tuesday, 18 February 2014

   तन्हाई 

आज फिर किसी ने मुझे तन्हा कर दिया 
बड़े विश्वास से थामा था दामन किसी का मैंने
पर बड़ी बेदर्दी से उसने मेरा हाथ झटक दिया
ऐसा नही है की सदा अकेला ही चला दुनिया की राहो  पर
मगर वक़्त बदलते ही
हरेक ने मुझे अपने कारवां से बाहर कर दिया 
अब जब जिन्दगी की शाम होने को आई 
थक गया हूँ मै और जिन्दगी के धूप छाँव अब सह नही सकता 
तो वक़्त ने बांह पकडकर मुझे राह पर एक तरफ खड़ा कर दिया 
मै तो खड़ा खड़ा नेपथ्य में कर लूँगा इन्तजार रात का 
पर जब तुम जागोगे नींद से और नही पाओगे निशान भी मेरे
तब समझोगे की कोई था अपना जो आज छोडकर चल दिया  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

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