Tuesday, 18 February 2014

तन्हाई 
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है
बोला मन कि जब तन से हो अलग उड़ जाता है मन
तब वो तन से निकली हुई एक आह होती है
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है


यादो के पंखो पर बैठ कर मन जब
अतीत के आकाश में  उड़ जाता है
कभी रोता है कुछ याद करके  और
कभी खुद ब खुद मुस्कराता है
पर है ये नियति जिस्म की
 के  फिर भी होठ उसके मुस्कराते है और
आँखे भी उसी की रोती है,
पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

है समुन्द्र तन्हाई का गहरा इतना कि
मन इसमें न जाने कंहा डूब जाता है
और वक़्त  की मृगतृष्णा में भटककर
जब ढूंढता है
इन समय की सीपियो में ख़ुशी के मोती 
तब जिस्म की इस किश्ती को
साँसों की पतवार ही  ढोती है

पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

पूछा फिर दिल ने की जब उड़ता है मन
 तो जिस्म ये तन्हाई का बोझ क्यों उठाता है
हंस कर बोल मन की 
जब आती है मिलन की बेला 
तो सच्चे प्रेमी कि तरह मिटजाता है जिस्म
और दिल मन के साथ उड़ जाता है
जिन्दगी मौत के जब मिलती है गले 
तब हो जाता है जिस्म तन्हा इतना
कि फिर तन्हाई की गुंजाईश भी कंहा होती है
 पूछा  इक दिन मेरे दिल ने मन से 
कि  ये तन्हाई क्या होती है......................

प्रवीन चन्द्र झांझी
    

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