Friday, 12 September 2014

मंजिल के पार 

परिंदे के जब पर निकले 
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार 
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा 

फिर जब भरी उड़ान पहली 
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा

फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा

इसी तरह बीतता गया समय 
और वो यू ही सोचता हुआ 
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर 
अपने घोंसले में लौट आता था

हो जाती थी रात और वो 
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा

फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब 
मंजिल और दूर होने लगी

फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी  
 

No comments:

Post a Comment