मंजिल के पार
परिंदे के जब पर निकले
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा
फिर जब भरी उड़ान पहली
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा
फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा
इसी तरह बीतता गया समय
और वो यू ही सोचता हुआ
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर
अपने घोंसले में लौट आता था
हो जाती थी रात और वो
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा
फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब
मंजिल और दूर होने लगी
फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
परिंदे के जब पर निकले
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा
फिर जब भरी उड़ान पहली
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा
फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा
इसी तरह बीतता गया समय
और वो यू ही सोचता हुआ
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर
अपने घोंसले में लौट आता था
हो जाती थी रात और वो
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा
फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब
मंजिल और दूर होने लगी
फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment