यथार्थ (REALITY)
उढ़ लो जितना उढ़ना है
मगर वापिस लोटकर यही आना है
घोंसले आकाश में नहीं बनते
आखिर बनाना जमीन पर ही आशियाना है
पेड़ हो चाहे ऊँचा जितना
आधार उसे फिर भी धरा को ही बनाना है
आज वक़्त की बुलंदियों पर हो तुम
लगता है तुम्हे की कदमो में तुम्हारे जमाना है
आज तुम हो जहाँ
कल कोई और था वहा
कल फिर कोई और होगा वंहा
यही इस जीवन का अफसाना है
डूबते सूरज की लाली समझाती है तुझे
हो गयी शाम अब तुम्हे घर जाना है
नहीं समझ पाते तुम की थोड़ी देर मै
आकाश को ढक लेगा अंधकार
तब दिशा का ज्ञान भी तुम्हे कहा रह जाना है
सफलता के आकाश में
भूल जाते है जो जमीन को
पढ़ता उन्हें फिर पीछे से पछताना है
तभी तो कहते है
मत भूलो उस समय को
जब छोडकर सब कुछ यही
आखिर फिर इसी धरा की गोद में जाना है l
लेखक प्रवीन चंदर झांझी
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