Wednesday, 9 July 2025

तन्हाई

तन्हाई 

आज फिर किसी ने मुझे तन्हा कर दिया 

बड़े विश्वास से थामा था
दामन किसी का मैंने

पर बड़ी बेदर्दी से उसने 
मेरा हाथ झटक दिया 

ऐसा नही है कि 
सदा अकेला ही चला दुनिया की राहो  पर 

मगर वक़्त बदलते ही 

हरेक ने मुझे अपने कारवां से बाहर कर दिया  

अब होने आई जब 
जिन्दगी की शाम तो 
थक गया हूँ मै 
और नही सह सकता 
ये जिन्दगी के धूप छाँव 

तो बांह पकडकर मुझे 
राह पर एक तरफ खड़ा कर दिया 

मै तो खड़ा खड़ा भी 
नेपथ्य में कर लूँगा 
इन्तजार रात का 

पर जब तुम जागोगे नींद से 
और नही पाओगे निशान भी मेरे 

तब समझोगे की कोई था 
अपना जो आज छोडकर चल दिया  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

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